परीक्षा और पैमाना

करीब साल भर पहले संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पद्धति के मसले पर हिंदी की पृष्ठभूमि के प्रतिभागियों के साथ अन्याय के खिलाफ आंदोलन खड़ा हो गया था और हजारों विद्यार्थी सड़कों पर उतर आए थे।

करीब साल भर पहले संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पद्धति के मसले पर हिंदी की पृष्ठभूमि के प्रतिभागियों के साथ अन्याय के खिलाफ आंदोलन खड़ा हो गया था और हजारों विद्यार्थी सड़कों पर उतर आए थे। मामले के तूल पकड़ने के बाद सरकार ने शिकायतों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित करने की बात कही थी और किसी भी भाषा के साथ भेदभाव न होने देने का भरोसा दिलाया था। लेकिन तब विरोध के सबसे बड़े मुद्दे सीसैट यानी सामान्य अध्ययन के प्रश्नपत्र-द्वितीय में बाईस अंकों वाले अंग्रेजी अंश को हटाने और पास करने के लिए न्यूनतम अंक तैंतीस फीसद निर्धारित करने के अलावा इस पूरे मामले पर कोई ठोस नीति सामने नहीं आ सकी थी।

अब सरकार ने प्रशासनिक सेवा परीक्षा के सभी पहलुओं पर विचार के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है, जो आयु में छूट, योग्यता, पाठ्यक्रम और पद्धति जैसे अनेक मुद्दों की समीक्षा करेगी। समिति की रिपोर्ट के आधार पर अगर सरकार को लगेगा कि इस परीक्षा की पद्धति में बदलाव अनिवार्य हैं, तो उस पर विचार होगा। इस कवायद का लक्ष्य यह बताया गया है कि गणित, इंजीनियरिंग, चिकित्सा विज्ञान, कला आदि विभिन्न विषयों के उम्मीदवारों के बीच भेदभाव की जिस तरह की शिकायतें आती रही हैं, उन्हें दूर किया जाएगा।

गौरतलब है कि संघ लोक सेवा आयोग की ओर से आइएएस और आइपीएस के चयन के लिए आयोजित होने वाली परीक्षा के पाठ्यक्रम को लेकर ऐसे आरोप तीखे रहे हैं कि यह गणित और इंजीनियरिंग की पृष्ठभूमि से पढ़ाई करके इन परीक्षाओं में हाथ आजमाने वालों को फायदा पहुंचाता है। खासतौर पर, प्रारंभिक परीक्षा में सीसैट के द्वितीय प्रश्नपत्र में अंग्रेजी की अनिवार्यता को कमजोर तबकों को प्रतियोगिता से बाहर रखने के तौर पर देखा गया था। इस लिहाज से देखें तो देश के सर्वोच्च प्रशासनिक तंत्र में शामिल होने वालों के लिए परीक्षा-पूर्व के आग्रहों और आरोपों से निपटने के लिए एक स्पष्ट नीति की जरूरत बनी हुई थी।

दरअसल, मौजूदा परीक्षा पद्धति लागू होने के बाद से अंग्रेजी को छोड़ दिया जाए तो अन्य भाषाओं के अभ्यर्थियों की सफलता की दर काफी तेजी से गिरी है। खासतौर पर ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थी इसे अपने लिए अवसरों के सिमटने के तौर पर देख रहे हैं। प्रश्नपत्रों के प्रारूप और उनकी भाषा ने कई सवाल खड़े किए हैं। सही है कि आज के दौर में अंग्रेजी, कंप्यूटर, गणित आदि की जानकारी जरूरी है।

लेकिन भारतीय समाज और संस्कृति का जो विस्तृत दायरा है, उसके मद्देनजर प्रशासनिक तंत्र में शामिल होने वालों के लिए दूसरे विषयों के बारे में जानना जरूरी क्यों न हो! फिर देश भर में शिक्षा-व्यवस्था की जैसी स्थिति है, उसमें साल-दो साल देर से पढ़ाई शुरू करने से लेकर शैक्षणिक सत्र में देरी जैसी कई वजहों से कमजोर तबकों के उम्मीदवारों को आयु में कुछ छूट की जरूरत हो सकती है। असल सवाल इन्हीं पहलुओं के बीच संतुलन बिठाने का है। अब इस मसले पर विशेषज्ञ समिति के गठन के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि इस परीक्षा से जुड़े तमाम पहलुओं पर विचार कर एक व्यापक नीति या दिशा-निर्देश का निर्धारण हो सकेगा।

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Next Stories
1 दुरुस्त आयद
यह पढ़ा क्या?
X