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हिंसा का चुनाव

यह छिपी बात नहीं है कि जबसे राजनीति में बाहुबल और धनबल का प्रवेश बढ़ा है, तब से चुनावों के समय हिंसक घटनाएं भी बढ़ी हैं। राजनीतिक पार्टियां दागी नेताओं से दूरी नहीं बना पातीं।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)

इस बार पश्चिम बंगाल में शायद ही कोई चरण रहा हो, जिसमें हिंसक घटनाएं न हुई हों। बिहार में भी कई जगह हिंसक घटनाएं हुर्इं। नक्सल प्रभावित इलाकों में कई जगह हिंसा हुई। ओड़ीशा में एक मतदान दल पर नक्सली हमले में एक महिला मतदान अधिकारी को अपनी जान गंवानी पड़ी। छठे चरण के मतदान में भी पश्चिम बंगाल में छिटपुट हिंसा की घटनाएं हुर्इं। वहां भाजपा की महिला प्रत्याशी को एक मतदान केंद्र के बाहर धक्का मारा गया। बिहार में गोली चली। ये दोनों राज्य ऐसे हैं, जहां राजनीतिक हिंसा का इतिहास रहा है। वहां राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता कुछ अधिक सक्रिय और वैचारिक रूप से उत्तेजित देखे जाते हैं। सोए चुनाव प्रचार के दौरान उनमें हिंसक झड़पें आम बात है। हत्याएं तक हो जाती हैं। विचित्र है कि राजनीतिक दल इसे अपनी ताकत मानते हैं। यह समझना मुश्किल है कि जब चुनाव को लोकतंत्र के उत्सव के रूप में प्रचारित-प्रसारित और लोगों को अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, तो राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं को यह समझाने में सफल क्यों नहीं हो पाते। क्या राजनीतिक दलों का यह धर्म नहीं कि वे अपने कार्यकर्ताओं को अनुशासन और लोकतंत्र की मयार्दा का पाठ पढ़ाएं।

यह छिपी बात नहीं है कि जबसे राजनीति में बाहुबल और धनबल का प्रवेश बढ़ा है, तब से चुनावों के समय हिंसक घटनाएं भी बढ़ी हैं। राजनीतिक पार्टियां दागी नेताओं से दूरी नहीं बना पातीं। यही वजह है कि हर बार चुनाव के बाद सदन में दागी नेताओं की संख्या कुछ बढ़ी हुई ही दर्ज होती है। बाहुबली नेताओं का प्रयास दबदबा कायम कर, मतदाताओं में दहशत पैदा कर और प्रतिपक्षी दलों को प्रचार-प्रचार से दूर रख कर कामयाबी हासिल करने का होता है। इसी तरह धनबल को मिले प्रश्रय का नतीजा यह है कि चुनाव के समय बड़े पैमाने पर नगदी, बहुमूल्य वस्तुएं, नशीले पदार्थ, यहां तक कि खतरनाक नशीली दवाएं बांटने का चलन बढ़ा है। इस बार छापेमारी में करोड़ों रुपए नगद और करोड़ों रुपए के नशीले पदार्थ बरामद किए गए। जाहिर है, जब ऐसी प्रवृत्ति के लोगों का राजनीति में प्रवेश बढ़ेगा और वे किसी भी तरीके से चुनाव जीत लेना ही अपनी उपलब्धि मानेंगे, तो राजनीतिक हिंसा का सिलसिला रोकना कठिन ही बना रहेगा। इस मामले में राजनीतिक दलों से स्वाभाविक अपेक्षा की जाती है कि वे लोकतांत्रिक मयार्दा का पालन करते हुए आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से दूरी बनाएं।

चुनाव के समय हिंसा पर काबू न पाए जा सकने में निर्वाचन आयोग की भी भूमिका रेखांकित होती है। इस बार चुनाव को करीब दो महीने तक फैला दिया गया। पश्चिम बंगाल में हर चरण में कुछ-कुछ सीटों के लिए मतदान रखा गया। तर्क दिया गया कि इस तरह चुनावी हिंसा पर काबू पाया जा सकेगा। सुरक्षा कर्मियों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने में आसानी होगी। इसके बावजूद अगर किसी प्रत्याशी की गाड़ी पर पत्थर मारे जा रहे हैं, किसी पर हमले हो रहे हैं, तो फिर आयोग की रणनीति कहां काम आई। शायद इस बात को समझने में उससे चूक हुई कि जब चुनाव को लंबे समय तक फैला दिया जाता है, तो इससे सुरक्षाबलों की तैनाती में तो आसानी होती है लेकिन शरारती तत्त्वों को एक से दूसरी जगह पहुंचने में मदद भी मिलती है। सर्वोच्च न्यायालय में साफ कह दिया है कि वे इस काम को पूरा करवा पाने में सक्षम नहीं है। दोनों प्राधिकरणों का यह कदम उन बयालीस हजार लोगों के लिए बड़ा झटका है जिन्होंने आम्रपाली की परियोजनाओं में घर खरीदने के लिए पैसे लगाए थे। सर्वोच्च अदालत में दोनों प्राधिकरणों ने जिस तरह से अपनी लाचारी जाहिर की है, वह हैरान करने वाली है।

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