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संपादकीय: सुरक्षा का संकट

बंदी के दौरान सबसे ज्यादा पुलिस और चिकित्सा कर्मी जान जोखिम में डाल कर काम में लगे हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि लोग इस बात को समझ नहीं रहे हैं और अफवाहों और गलत जानकारियों के शिकार हो रहे हैं और हमले जैसा कदम उठा रहे हैं। पिछले हफ्ते इंदौर की एक मुसलिम बस्ती में कोरोना संदिग्धों की जांच के लिए पहुंचे चिकित्सा कर्मियों के दल को डेढ़-दो सौ सोगों की भीड़ ने घेर लिया था।

Author Published on: April 8, 2020 5:26 AM
लॉकडाउन के दौरान पुलिस और डॉक्टरों पर हमले की घटनाएं बढ़ीं। प्रतीकात्मक तस्वीर।

इन दिनों पुलिस और चिकित्सा कर्मियों पर हमलों की बढ़ती घटनाएं चिंता पैदा करने वाली हैं। बंदी के दौरान लोग घरों से न निकलें, सड़कों पर न घूमें, इसका पालन करवाना पुलिस के लिए भारी साबित हो रहा है। इसी तरह लोग कोरोना जांच के लिए आने वाले चिकित्सा कर्मियों से भी सहयोग नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन पर हमले कर रहे हैं। सवाल है कि इस वक्त हम जिस संकट से गुजर रहे हैं, उसे लोग समझ क्यों नहीं रहे हैं। पुलिस पर हमले की ताजा घटना उत्तर प्रदेश के बरेली और मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में देखने को मिली। बरेली में पुलिस पर हमला उस वक्त हुआ, जब पुलिस शहर से सटे एक गांव में कुछ तबलीगियों के बारे में पूछताछ करने पहुंची। तभी बंदी के दौरान घूम रहे कुछ लोगों को घरों में रहने को कहा। इसी पर बढ़े विवाद में पुलिस एक शख्स को थाने ले आई। इसके बाद करीब पांच सौ ग्रामीणों ने थाने को घेर लिया। लाठीचार्ज कर बड़ी मुश्किल से भीड़ को खदेड़ा गया।

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में तो और बदतर स्थिति देखने में आई। शहर के इस्लामनगर में सोमवार रात जमा भीड़ को हटाने पहुंची पुलिस पर लाठियों, सरियों और चाकुओं से हमला कर दिया गया। बताया जा रहा है कि हमलावरों में दो कुख्यात अपराधी भी है, जिनकी शह पर यह हुआ। पुलिस ने सख्ती दिखाते हुए हमलावरों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मामला दर्ज कर लिया है, लेकिन इस घटना से यह तो साफ है कि अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और वे पूर्ण बंदी को सफल नहीं होने देने के लिए इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। सरियों, चाकू से होने वाले हमले का मतलब है कि शरारती तत्व पहले से तैयार थे।

दरअसल, ज्यादातर जगहों पर अब नई समस्या यह सामने आ रही है कि सूचनाओं के आधार पर पुलिस तबलीगी जमात से लौटे लोगों की तलाश में जहां-जहां जा रही है, उसे ऐसे विरोध और हमलों का सामना करना पड़ रहा है। अगर पुलिस ऐसे लोगों का पता नहीं लगाएगी और तबलीगी जमात से लौटे लोग स्वयं बाहर आकर सच नहीं बताएंगे, तो न जाने कितने लोगों में यह संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ता चला जाएगा।

बंदी के दौरान सबसे ज्यादा पुलिस और चिकित्सा कर्मी जान जोखिम में डाल कर काम में लगे हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि लोग इस बात को समझ नहीं रहे हैं और अफवाहों और गलत जानकारियों के शिकार हो रहे हैं और हमले जैसा कदम उठा रहे हैं। पिछले हफ्ते इंदौर की एक मुसलिम बस्ती में कोरोना संदिग्धों की जांच के लिए पहुंचे चिकित्सा कर्मियों के दल को डेढ़-दो सौ सोगों की भीड़ ने घेर लिया था। हालांकि जांच टीम के लोग किसी तरह बच निकले और जान बचाई। जिस तरह से लोग हमले कर रहे हैं, वे अचानक होने वाले हमले नहीं हैं। ये सुनियोजित हमले हैं। हालांकि इसके पीछे एक वजह यह भी है कि लोगों में जांच कराने को लेकर डर है।

जानकारी के अभाव में लोगों को लगता है कि कहीं पुलिस पकड़ कर उन्हें चौदह-पंद्रह दिन के लिए अलग न कर दे। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तरह की घटनाओं के बावजूद चिकित्सा कर्मियों और पुलिस ने ज्यादातर मौकों पर संयम का परिचय दिया है। इस तरह के हमले कर्तव्य-निर्वहन में जुटे कर्मियों के मनोबल पर बुरा असर डालते हैं। इसलिए आपराधिक तत्वों के सख्ती जरूरी है।

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