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संपादकीय: बंदी का विस्तार

बहुत सारी जगहों पर लोग समूह में जमा होकर राशन खरीदने लगे, तो कुछ धार्मिक कार्यक्रमों में शरीक होने लगे, कई जगह पुलिस की सख्ती के खिलाफ लोगों ने हमले किए, कई संक्रमित मरीज अस्पतालों से भाग कर लापता हो गए। इस तरह संक्रमण का दायरा बढ़ता गया। अभी तक ठीक से अंदाजा नहीं लगाया जा सका है कि संक्रमण कहां तक फैल सकता है।

Author Published on: April 9, 2020 1:41 AM
कोरोना वायरस लॉकडाउन के चलते सुनसान पड़ी सड़कें। (PTI Photo)

पूर्णबंदी की घोषित अवधि समाप्त होने के नजदीक है, पर कोरोना विषाणु के संक्रमण का दायरा सिमट नहीं पा रहा। ऐसे में इस अवधि के विस्तार की मांग स्वाभाविक है। नौ राज्य सरकारों ने इसके पक्ष में राय दी है। हालांकि केंद्र सरकार अभी तय नहीं कर पाई है कि इस मामले में क्या करना चाहिए, पर अधिकतर लोग इस अवधि को बढ़ाने के पक्ष में हैं। जो लोग पंद्रह अप्रैल से बंदी खत्म कर देने के पक्ष में हैं, उनका तर्क अर्थव्यवस्था को हो रहे नुकसान, कारोबारी गतिविधियों के रुकने से हो रही दिक्कतों, श्रमिकों के जीवन पर पड़ रहे दुष्प्रभाव आदि को लेकर है। इसमें दो राय नहीं कि बंदी का फैसला सरकार के लिए आसान नहीं था, उसका असर चौतरफा नजर आने लगा है।

लाखों लोगों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है, तो बहुत सारे लोगों के सामने दो वक्त के भोजन की समस्या खड़ी हो गई है। इसी से घबराए श्रमिकों ने पैदल ही अपने गांवों की तरफ लौटना शुरू कर दिया था। हालांकि तमाम राज्य सरकारों और कई स्वयंसेवी संगठनों ने बेरोजगारी का दंश झेल रहे लोगों के रहने और भोजन आदि की जिम्मेदारी उठाई है। पर उनके सामने भी यह चुनौती तो है कि इस तरह वे कितने दिन तक ये सब सुविधाएं उपलब्ध करा सकेंगे।

पर इससे बड़ी चुनौती है किसी भी कीमत पर मानव जीवन को बचाना। कोई भी कल्याणकारी राज्य अपने नागरिकों को किसी बीमारी से मरते नहीं देख सकता। कोरोना विषाणु एक ऐसी महामारी के रूप में उभरा है कि उसे रोकने में हुई मामूली लापरवाही भी भयानक तबाही का कारण बन सकती है। कोरोना संक्रमितों की संख्या में रोज इजाफा हो रहा है। हालांकि इलाज के बाद रोज सैकड़ों लोग ठीक होकर अपने घर लौट रहे हैं, पर मरने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। भारत एक ऐसे मोड़ पर है, जहां मामूली लापरवाही भी इसे सामुदायिक संक्रमण की ओर धकेल देगी और तब इससे पार पाना आसान नहीं रह जाएगा। इक्कीस दिन की बंदी के पीछे इरादा यह था कि इससे लोगों का आपस में संपर्क नहीं हो पाएगा और कोरोना का संक्रमण जहां तक पहुंचा है, वहीं रुक जाएगा। फिर चरणबद्ध तरीके से बंदी हटाई जा सकती है। पर कई जगह लोगों ने इसका पालन नहीं किया।

बहुत सारी जगहों पर लोग समूह में जमा होकर राशन खरीदने लगे, तो कुछ धार्मिक कार्यक्रमों में शरीक होने लगे, कई जगह पुलिस की सख्ती के खिलाफ लोगों ने हमले किए, कई संक्रमित मरीज अस्पतालों से भाग कर लापता हो गए। इस तरह संक्रमण का दायरा बढ़ता गया। अभी तक ठीक से अंदाजा नहीं लगाया जा सका है कि संक्रमण कहां तक फैल सकता है।

ऐसी स्थिति में अगर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लौटाने या लोगों के रोजी-रोजगार की चिंता से बंदी को समाप्त करने का फैसला किया जाएगा, तो मुश्किलें बढ़ेंगी ही। उचित ही केंद्र सरकार भी इसकी अवधि बढ़ाने के पक्ष में है। एक बार ठीक से पता चल जाए कि संक्रमण का दायरा कहां तक फैला है और उस पर काबू पाने के लिए किस तरह के कदम उठाने ठीक होंगे, फिर बंदी खत्म करने के बारे में सोचा जा सकता है। उसके बाद भी बंदी को एकदम से समाप्त करना संभव नहीं होगा, उसे चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना होगा। फिलहाल यही उचित है कि बंदी की अवधि को विस्तार दिया जाए।

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