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संपादकीयः पंजाब में हत्याएं

पंजाब में पंद्रह दिन के भीतर दूसरे हिंदू नेता की हत्या से फिर सवाल उठा है कि क्या यह केवल लचर प्रशासन के बीच बेखौफ अपराधियों की करतूत है या किसी सुनियोजित साजिश का नतीजा है।

Author November 1, 2017 2:19 AM
अज्ञात हमलावरों ने सोमवार को अमृतसर में स्थानीय हिंदू संघर्ष समिति के अध्यक्ष विपिन शर्मा पर सरेआम गोलियां बरसा कर उनकी हत्या कर दी।

पंजाब में पंद्रह दिन के भीतर दूसरे हिंदू नेता की हत्या से फिर सवाल उठा है कि क्या यह केवल लचर प्रशासन के बीच बेखौफ अपराधियों की करतूत है या किसी सुनियोजित साजिश का नतीजा है। अज्ञात हमलावरों ने सोमवार को अमृतसर में स्थानीय हिंदू संघर्ष समिति के अध्यक्ष विपिन शर्मा पर सरेआम गोलियां बरसा कर उनकी हत्या कर दी। इतने कम अंतराल पर जिस तरह हिंदू संगठनों से जुड़े दो नेताओं की हत्या कर दी गई है, उससे स्वाभाविक ही इस ओर ध्यान जाता है कि कहीं इसमें कोई सांप्रदायिक या जातीय कोण तो शामिल नहीं है! हालांकि ताजा घटना के बाद अमृतसर के पुलिस आयुक्त ने साफतौर पर कहा कि इस हत्याकांड को फिलहाल किसी धार्मिक पहचान से जुड़े घटनाक्रम के साथ नहीं जोड़ा जा सकता है; सीसीटीवी फुटेज में एक अपराधी का चेहरा दिख रहा था; इसके अलावा भी कई अहम जानकारियां मिली हैं और पुलिस हर पहलू से घटना की जांच कर रही है। मगर सवाल है कि आखिर पंजाब में ऐसी कौन-सी स्थिति पैदा हो रही है जिसमें अपराधी इस कदर बेखौफ हो रहे हैं?

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बीते सत्रह अक्तूबर को लुधियाना में आरएसएस नेता रवींद्र गोसार्इं की भी इसी तरह दिनदहाड़े गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। इन्हें सामान्य आपराधिक घटनाओं की तरह देखा जा सकता है। लेकिन हकीकत यह है कि पिछले दो सालों के दौरान पांच ऐसे नेताओं की जान ले ली गई, जिन्हें स्थानीय स्तर पर हिंदू नेताओं के रूप में जाना जाता था। अगर उन हत्याओं के मामले में कुछ प्रवृत्तियां समान नजर आएं तो ऐसे में शक का सिरा स्वाभाविक ही इन घटनाओं के सुनियोजित साजिश की ओर जाता है। इन नेताओं की हत्या में शामिल लोगों के खिलाफ तत्काल सख्ती इसलिए भी जरूरी है कि अगर किसी खास धार्मिक पहचान वाले नेताओं की हत्या एक प्रवृत्ति बनती है तो यह समाज के लिए ज्यादा चिंताजनक है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि तमाम सबूत होने के बावजूद पुलिस घटना का पर्दाफाश नहीं कर पा रही है।

पंजाब में करीब सात महीने पहले नई सरकार बनने के बाद यह उम्मीद की गई थी कि कानून-व्यवस्था की बदहाली पर थोड़ा नियंत्रण होगा। लेकिन हालत यह है कि हाल के दिनों में कई वारदात के अपराधियों का सुराग पुलिस अब तक नहीं खोज सकी है। यह तब है जब कई घटनाएं सीसीटीवी में कैद हो गर्इं या फिर उनका वीडियो चारों तरफ फैल गया और उनमें अपराधियों के चेहरे साफ पहचाने जा सकते थे। इसके बावजूद अगर पंजाब में खुफिया तंत्र और पुलिस अपराधियों को पकड़ने में सफल नहीं हो पा रही है, तो यह अपने आप में राज्य की कानून-व्यवस्था पर एक सवालिया निशान है। हालांकि इसके बरक्स एक सच यह भी है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान पंजाब पुलिस को आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त कई संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार करने में अहम कामयाबी मिली है। लेकिन सरेआम हत्याकांड को अंजाम देने वाले शातिर अपराधियों या गैंगस्टरों को पकड़ने में वह नाकाम रहती है तो उसे क्या कहा जाए? जब ऐसे अपराधी बेखौफ हत्या या दूसरे अपराधों को अंजाम दे रहे हैं तो इस बात की क्या गारंटी है कि उनमें से किसी का सिरा आतंकी गिरोहों से नहीं जुड़ा है!

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