यह चिंता की बात है कि देश की जेल में बंद होने के बावजूद किसी कैदी पर अपनी आपराधिक गतिविधियां संचालित करने के आरोप लगते हैं और मामला अन्य देशों के दायरे में भी पहुंच जाता है। सरकार को जहां समय रहते इस मसले पर सख्त कदम उठाना चाहिए था, वहां उसने लगातार इस सवाल की अनदेखी की कि जेल में होने के बावजूद कोई कैदी कैसे अपनी मनमानी कर पा रहा है और उसे किसका संरक्षण मिला हुआ है।

ऐसे आरोप आम रहे हैं कि कुख्यात अपराधी लारेंस बिश्नोई जेल में बंद होने के बावजूद देश और विदेश में काम कर रहे अपने गिरोह के जरिए हत्या, रंगदारी और फिरौती जैसे गंभीर अपराधों को अंजाम देता रहा है।

अब अमेरिका के न्याय विभाग के आरोपपत्र में लारेंस बिश्नोई गिरोह को अभिनेता सलमान खान के घर पर गोलीबारी, पंजाबी अभिनेता और गायक गिप्पी ग्रेवाल को धमकी तथा पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला की हत्या को अंजाम दिलाने जैसी कई घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। आरोपपत्र में यह भी कहा गया है कि इस संगठित गिरोह के सदस्यों ने अक्सर भारत और विदेश में बसे भारतीय समुदाय की सांस्कृतिक और राजनीतिक हस्तियों तथा बड़े व्यावसायियों को हिंसा का निशाना बनाया।

जाहिर है, लारेंस बिश्नोई की हरकतों के बारे में जितनी भी जानकारी सामने आ सकी है, उस आलोक में अमेरिका के न्याय विभाग के आरोपपत्र में आए तथ्य हैरान नहीं करते हैं। मगर यह समझना मुश्किल है कि वह अपनी आपराधिक योजनाएं बनाने से लेकर उन्हें अंजाम देने तक की सुविधाएं कैसे और किसके जरिए हासिल करता रहा। अब एक अभियान के तहत अमेरिका, कनाडा और स्पेन की कानून प्रवर्तन एजंसियों ने मिल कर जो कार्रवाई की है, उसमें तीन देशों में चौबीस लोगों की गिरफ्तारी की गई और सैंतीस के खिलाफ आरोप तय किए गए।

विचित्र यह है कि बिश्नोई की आपराधिक गतिविधियों के लिए किसी अन्य देश में आरोपपत्र तय किए जाते हैं, लेकिन भारत में ऐसी ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई, जिससे जेल में बंद एक कुख्यात कैदी को अपना अपराध-तंत्र संचालित करने से रोका जा सके। बिश्नोई के गिरोह के सदस्य सोशल मीडिया पर अपना प्रभाव बढ़ाने और भय पैदा करने के लिए खुलेआम धमकी जारी करते थे, तो उनके खिलाफ समय पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

गौरतलब है कि कनाडा में एक खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप लारेंस बिश्नोई गिरोह पर लगा था और उसी संदर्भ में भारत और कनाडा के बीच गंभीर कूटनीतिक विवाद पैदा हो गया था। अब अमेरिकी न्याय विभाग के आरोपपत्र के बाद सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत में पुलिस बिश्नोई को जेल में मोबाइल फोन और इंटरनेट आधारित संचार उपकरणों का उपयोग करने की सुविधा देने वाले तंत्र का पता लगाए और उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करे।

बिश्नोई अगर जेल में बंद रहते हुए भी अपनी आपराधिक योजनाओं को अंजाम दे पाता था, तो उसमें यही पहलू सबसे अहम है कि उसे तकनीकी संसाधन कैसे हासिल हुए और उसे मुहैया कराने तथा आसानी से उसका इस्तेमाल करने की सुविधा उसे किसके संरक्षण में मिलती थी।

क्या इसमें सिर्फ संबंधित जेल के कर्मचारियों या अधिकारियों की मिलीभगत थी या फिर उसके तार उच्च स्तर पर कहीं जुड़े थे? उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत में लारेंस बिश्नोई को जेल में एक आम कैदी की तरह ही रखा जाएगा और उस पर भी कानून के सख्त प्रावधान लागू होंगे।

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आमतौर पर किसी हादसे के बाद उसके कारणों पर बात होती है। सरकार मामले की तह तक पहुंचने के लिए जांच एजेंसी गठित करती है। मगर उसके बाद शायद ही कभी कारणों के तमाम पहलुओं के आधार पर हादसों से निपटने के लिए कोई व्यापक कार्ययोजना बनती है और उसे एक नियमन की तरह देखा जाता है। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरा संपादकीय।