बिहार के पटना में विद्यार्थियों के प्रदर्शन के दौरान राज्य की पुलिस का जैसा रवैया सामने आया है, उसे आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत किसी मसले पर सरकार से विचार की मांग के स्वर का दमन करने की तरह देखा जा सकता है।

सवाल है कि अगर नागरिकों के सामने अपनी किसी मांग के लिए आंदोलन या प्रदर्शन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता है, तो संवाद के जरिए उनकी समस्या का समाधान करने या कोई रास्ता निकालने की कोशिश की जाएगी या उन्हें चुप कराने के लिए सीधे लाठी-डंडे का सहारा लिया जाएगा?

हैरानी की बात है कि शिक्षक भर्ती से संबंधित प्रक्रिया में लगातार देरी और टालमटोल से परेशान विद्यार्थियों ने जब पटना में विरोध प्रदर्शन करने की कोशिश की, तो उनकी मांगों पर विचार करने के बजाय उन पर लाठी चार्ज किया गया और महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया।

अगर उन्हें रोकना भी था, तो पानी की बौछार या कोई अन्य उपाय करने के बजाय बेहरमी से उन पर लाठियां चलाना ही अकेला उपाय क्यों माना गया?

राज्य की पुलिस के इस रवैये को क्या किसी भी तरह से प्रदर्शनकारियों के प्रति एक लोकतांत्रिक शासन की प्रतिक्रिया कहा जा सकता है? अगर नागरिकों के किसी हिस्से को सरकार से अपने अधिकार या अन्य मांग करने से इस तरह रोका जाएगा, तो उसमें नागरिक अधिकारों की क्या जगह रह जाएगी?

आखिर क्या वजह है कि विद्यार्थियों के सामने शिक्षक भर्ती को लेकर गुमराह करने का आरोप लगाने की नौबत आई है? यह कोई पहला मौका नहीं है जब किसी आंदोलन या प्रदर्शन को लेकर सरकार का यह रुख सामने आया है।

इससे पहले भी कई बार विद्यार्थियों और अन्य नागरिक समूहों ने अलग-अलग मुद्दे पर प्रदर्शन किया है, लेकिन उनकी मांगों पर विचार या बातचीत करने के बजाय उन्हें चुप करने और भगाने के लिए लाठी चार्ज का सहारा लिया गया।

अफसोसनाक यह है कि बिहार में जो पार्टियां फिलहाल सत्ता में हैं, उन्होंने एक समय जनता की उपेक्षा किए जाने को ही मुद्दा बनाया था। हकीकत यह है कि आंदोलनों या प्रदर्शन के प्रति पिछले कुछ वर्षों से राज्य सरकार का जो रवैया है, उससे लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के लिए जगह सिमट रही है।