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संपादकीय: अपराध बेलगाम

बिहार में अपराधों के मामले में पिछले कुछ समय से लगातार जिस तरह के हालात बने हुए हैं, उससे साफ लग रहा है कि वहां कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर सरकार और प्रशासन एक तरह की लाचारगी की हालत में हैं और अपराधियों के मनोबल बढ़े हुए हैं।

Author Updated: January 14, 2021 7:10 AM
crmeसांकेतिक फोटो।

अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराध अब एक बार फिर राज्य की छवि बनते जा रहे हैं और सरकार केवल सख्त कार्रवाई का आश्वासन जारी कर अपना कर्तव्य पूरा मान लेती है।

जबकि राज्य को सुशासन देने के भरोसे पर ही मौजूदा गठबंधन ने जनता से समर्थन हासिल किया था। मगर आज तस्वीर चिंताजनक दिख रही है। राज्य की राजधानी पटना में मंगलवार की शाम इंडिगो विमान कंपनी के एक मैनेजर पर जिस तरह गोलियों की बौछार कर दी गई, उससे यही लगता है कि अपराधियों के भीतर किसी तरह का खौफ नहीं है। हत्या को अंजाम देकर अपराधी सरेआम गोलियां चलाते हुए आराम से फरार हो गए। मारे गए व्यक्ति का किसी भी तरह के अपराध में संलिप्त होने का कोई इतिहास नहीं था, फिर भी उसकी जान ले ली गई।

दरअसल, राज्य में पिछले कुछ सालों से जैसे हालात बनते जा रहे हैं, उसमें किसी आम नागरिक की हत्या की यह कोई चौंकाने वाली घटना नहीं है। हाल के महीनों में लगभग हर जिले से हत्या, अपहरण, बलात्कार, लूट आदि अपराधों की बढ़ती संख्या ने सरकार और पुलिस की कार्यशैली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। ऐसा नहीं है कि बिहार में अपराधों को लेकर हाल के दिनों में कोई बड़ी तेजी आई है। इसमें एक तरह की निरंतरता रही है।

बीते साल राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में यह बताया गया था कि बिहार के पंद्रह जिलों में हत्या की घटनाएं ज्यादा होती हैं। यों अन्य जिले भी अपराधों से मुक्त नहीं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे जघन्य अपराधों का ग्राफ पिछले सालों के मुकाबले तेजी से ऊपर गया है। हर रोज जघन्य अपराधों की जैसी घटना सामने आ रही है, उससे ऐसा लगने लगा है कि या तो कानून-व्यवस्था पर सरकार का नियंत्रण बेहद कमजोर हो गया है या फिर अपराधियों को खुली छूट मिल गई है! वरना क्या वजह है कि एक अपराध पर लोग चिंता जता रहे होते हैं कि कहीं दूसरी जगह से उससे गंभीर घटना की खबर आ जाती है।

सच यह है कि अब आम लोगों के बीच एक परोक्ष डर हावी रहने लगा है और कुछ लोग राज्य में अपराधों के पुराने दिनों को याद करने लगे हैं। अफसोस की बात यह है कि राज्य की मौजूदा गठबंधन सरकार के सत्ता में आने का सबसे अहम नारा लोगों को सुशासन मुहैया कराना था, मगर अब इस नारे की हकीकत सबके सामने है। खासतौर पर इस बार सत्ता संभालने के बाद ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार एक विचित्र प्रकार की उलझन से गुजर रहे हैं।

एक समय उनके बारे में यही बात प्रचारित थी कि प्रशासन की चौकसी और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर वे कोई नरमी नहीं बरतते हैं, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि अपराधियों को रोकने-टोकने वाले महकमे लाचार खड़े सब कुछ होते देख रहे हैं। जबकि राज्य की पुलिस और अपराधों की रोकथाम करने वाले सभी महकमों को राजनीतिक समीकरणों के भीतर की दुनिया में उठा-पटक से इतर अपना काम ईमानदारी से करना चाहिए, क्योंकि तकनीकी तौर पर कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर सरकार सहित जनता की ओर से उठे सभी सवालों के कठघरे में वही खड़े होंगे।

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