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संपादकीय : कुपोषित बचपन

जिस दौर में विकास के दावे बढ़-चढ़ कर किए जा रहे हों और अर्थव्यवस्था की मजबूती को इस तरह आंका जा रहा हो कि महामारी और पूर्णबंदी के बावजूद यह फिर से पहले की तरह चमकने को तैयार है, तो उसमें कुपोषण की खबरें चौंकाती हैं!

childभोजन नहीं मिलने से बच्‍चे परेशान। फाइल फोटो।

लेकिन सच यह है कि पिछले करीब एक दशक से एक ओर विकास और अर्थव्यवस्था के आंकड़े सामने रखे जाते हैं और दूसरी ओर भारी तादाद में आम गरीब और कमजोर तबके के परिवारों को संतोषजनक तरीके से पेट भर खाना पाने के लिए जद्दोजहद करना पड़ा है।

ऐसे लोगों की संख्या बड़ी है, जो सरकार की ओर से चलाए जा रहे कल्याण कार्यक्रमों के तहत मिलने वाले या फिर सस्ती दरों पर मुहैया कराए गए अनाज के बूते जिंदा रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से उन कार्यक्रमों की क्या स्थिति चल रही है, यह समझना मुश्किल नहीं है। इस स्थिति में दोहरी और गंभीर मार ज्यादा तीखी इसलिए भी हो गई है कि पूर्णबंदी की शुरूआत के महीनों में सख्ती और अब उसमें ढिलाई के बावजूद रोजी-रोजगार के हालात सामान्य नहीं हुए हैं और भारी तादाद में ऐसे परिवार हैं जिनके सामने आज जीवन-संघर्ष की हालत है।

हाल के महीनों में ऐसी आबादी का दायरा और बढ़ता गया है, जो पोषणयुक्त भोजन से दूर महज कामचलाऊ खाना मिलने भर से अपनी जिंदगी चला रहे थे। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस आबादी के बीच बच्चों के पोषण की स्थिति क्या होगी और उनके कमजोर होने की हालत में बीमारियों और अन्य चुनौतियों के सामने उनकी जीवन-संभाव्यता कितनी होगी।

शायद यही वजह है कि केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्र लिख कर मुख्य सचिवों को बच्चों में गंभीर कुपोषण का पता लगाने और जरूरत पड़ने पर उन्हें अस्पतालों या आयुष केंद्रों में भिजवाने को कहा है। पत्र के मुताबिक यह प्रक्रिया इस महीने के आखिर तक पूरी हो जानी चाहिए।

निश्चित रूप से इस पहल के पीछे बच्चों में कुपोषण के हालात के प्रति चिंता दिखाई देती है, मगर बच्चों में गंभीर कुपोषण की हकीकत कोई दो-चार दिनों में खड़ी हुई मुश्किल नहीं है। यह लंबे समय तक खानपान में कमी या पर्याप्त पोषण नहीं मिलने से पैदा हुई व्यापक समस्या है। ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि अगले चार-पांच दिनों के भीतर इस निर्देश पर पूरी तरह अमल कैसे सुनिश्चित कराया जा सकेगा!

यह किसी से छिपा नहीं है कि कमजोर तबकों के परिवारों के बच्चों के बीच कुपोषण की समस्या से पार पाने के लिए एकीकृत बाल विकास सहित तमाम कार्यक्रमों की पिछले करीब साल भर से क्या हालत रही है ? स्कूलों के बंद रहने के दौरान दोपहर के भोजन से लेकर आंगनबाड़ी योजना के तहत भी बच्चों को कितना खाना मिल सका है, यह भी जगजाहिर रहा है।

ऐसे में पहले ही गरीबी की मार झेल रहे परिवारों के बच्चों में कुपोषण की स्थिति ज्यादा गंभीर हुई। हालांकि पूर्णबंदी के दौरान रोजी-रोजगार के लगभग खत्म हो जाने के चलते बड़ी संख्या में लोग दो शाम के भोजन तक से लाचार हो गए थे। ऐसे लोगों की मदद के लिए सरकार की ओर से कुछ राशन मुहैया कराने की व्यवस्था की गई थी। मगर उसका महत्त्व सीमित रहा। वैश्विक पोषण रिपोर्ट, 2020 के मुताबिक भारत में पोषण की स्थिति बेहद गंभीर होती जा रही है और दुनिया भर में केवल नाइजीरिया और इंडोनेशिया जैसे देश ही ऐसे हैं, जहां हमसे खराब हालत है। ऐसे में इस समस्या पर बिना देर किए तुरंत ध्यान देने की जरूरत समझी जा सकती है।

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