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संपादकीय: असंयमित आंदोलन

पिछले दो महीने से बड़े संयम, अनुशासन और सिद्धांतों के साथ संचालित हो रहा किसान आंदोलन गणतंत्र दिवस की ट्रैक्टर परेड में कैसे अपनी दिशा भटक गया, यह सवाल सबको मथ रहा है।

Author Updated: January 27, 2021 6:22 AM
farmerसांकेतिक फोटो।

काफी मशक्कत के बाद किसान नेताओं को ट्रैक्टर परेड करने की लिखित अनुमति मिली थी। पुलिस और संयुक्त किसान मोर्चा नेताओं के बीच आपसी सहमति से परेड के मार्ग तय हुए थे। किसान नेताओं ने बार-बार किसान आंदोलनकारियों से अपील की थी कि वे किसी भी रूप में बदअमनी न फैलाएं। अनुशासन में रहें और तय मार्गों का ही अनुसरण करें।

परेड को अनुशासित रखने के लिए किसानों की तरफ से बड़े पैमाने पर स्वयंसेवक भी तैनात किए गए थे। पुलिस और नेताओं के बीच तय हुआ था कि जब इंडिया गेट की मुख्य परेड खत्म हो जाएगी, उसके बाद ही ट्रैक्टर परेड निकलेगी। ट्रैक्टर परेड दिन के बारह बजे से दिल्ली के बाहरी रिंग रोड पर शुरू होनी थी। मगर सिंघू बार्डर की तरफ से कुछ किसानों ने सुबह साढ़े सात बजे ही अपनी गतिविधियां शुरू कर दीं और दिल्ली की तरफ रवाना हो गए। उन्हें रोकने के लिए पुलिस ने जगह-जगह अवरोध लगाए, मगर किसान उन्हें तोड़ कर आगे बढ़ चले। मजबूरन कई जगह पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा, आंसू गैस के गोले दागने पड़े।

इस परेड में जो कुछ हुआ, उसकी आशंका पहले से जताई जा रही थी, मगर कुछ दिनों पहले किसानों ने जिस तरह संयमित ढंग से ट्रैक्टर परेड निकाली थी, उससे तो लग रहा था कि गणतंत्र दिवस पर भी वे अनुशासन का परिचय देंगे। मगर बहुत सारे किसानों में एक भावना यह बनी हुई थी कि लालकिले पर झंडा फहरा कर अपनी ताकत का प्रदर्शन करना है।

कई तो इंडिया गेट पर भी परेड को उत्साहित थे। यह भावना इसलिए बनी थी कि कुछ किसान नेता ऐसे जोशीले बयान पहले से देते आ रहे थे। यों तो कई किसान नेता बार-बार दोहरा रहे थे कि वे गणतंत्र की आन बान शान में कोई कमी नहीं आने देंगे, वे दिल्ली का दिल जीतने के लिए यह परेड निकाल रहे हैं, मगर कई जगहों पर इस परेड को लेकर उग्रता पूर्ण उत्साह भी देखा जा रहा था।

उसी का नतीजा था कि तय मार्ग छोड़ कर बड़ी संख्या में किसान लालकिले की तरफ मुड़ गए और वहां जाकर लालकिले की प्राचीर पर अपना झंडा फहरा दिया। यह निस्संदेह किसी भी रूप में लोकतंत्र के लिए गर्व का विषय नहीं कहा जा सकता। कोई भी लोकतंत्र अपने प्रतीकों पर हमले की इजाजत नहीं देता।

हालांकि कुछ किसान नेताओं का आरोप है कि पुलिस ने तय मार्गों पर अवरोध खड़े कर परेड रोकने की कोशिश की, इसलिए वे उग्र हो गए। कुछ का यह भी कहना है कि इस आंदोलन में बहुत सारे ऐसे भी लोग घुस आए थे, जो संयुक्त किसान मोर्चे का हिस्सा नहीं हैं। कुछ बाहरी शरारती तत्त्वों ने भी इस परेड को गुमराह करने की कोशिश की। हकीकत क्या है, इसका पता जांच के बाद ही चलेगा।

मगर दिल्ली में जगह-जगह हुए उत्पात से किसान आंदोलन की काफी बदनामी हुई है। उन सिद्धांतों पर सवाल खड़े हुए हैं, जिन्हें लेकर यह आंदोलन इतने दिनों से चल रहा था। यह सही है कि इतनी बड़ी संख्या में जब कहीं आंदोलनकारी जमा हो जाते हैं, तो उन्हें अनुशासित रख पाना कठिन होता है, मगर इस तर्क पर किसान नेता अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते। निस्संदेह यह उनके लिए भी शर्मिंदगी का विषय है।

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