इसमें कोई दोराय नहीं कि समय के साथ बदलती तकनीक ने सभी क्षेत्रों में अपनी अनिवार्य जगह बनाई है और किसी भी प्रौद्योगिकी को अद्यतन तथा उपयोगी बनाए रखने के लिए यह जरूरी भी है। डिजिटल संरचना से लैस करना किसी भी संयंत्र की उपयोगिता बनाए रखने का सबसे अहम जरिया बन गया है।
मगर यह भी तथ्य है कि जैसे-जैसे हर स्तर पर डिजिटल दायरे का विस्तार हो रहा है, वैसे-वैसे साइबर फर्जीवाड़े से लेकर हमलों तक का संजाल भी फैलता जा रहा है। मामला केवल पैसों की ठगी या धोखाधड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग बड़े महत्त्व के संस्थानों से लेकर बेहद संवेदनशील इकाइयों में भी जिस तरह साइबर सेंधमारी की घटनाएं सामने आ रही हैं, वह अब समूची दुनिया में एक व्यापक चिंता का कारण बन रही है।
हैरानी की बात यह है कि एक ओर लगभग सभी क्षेत्रों में छोटे से लेकर बड़े काम तक का डिजिटलीकरण किया जा रहा है और साइबर सुरक्षा के सवाल को सबसे महत्त्वपूर्ण बताया जा रहा है, दूसरी ओर आए दिन साइबर हमलों या फर्जीवाड़े की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी की खबरें आ रही हैं।
गौरतलब है कि तमिलनाडु के कुडनकुलम स्थित देश की सबसे बड़ी परमाणु ऊर्जा परियोजना से जुड़े हजारों संवेदनशील और गोपनीय प्रकृति के दस्तावेज सार्वजनिक होने की खबर के बाद साइबर सुरक्षा के मसले पर व्यापक चिंता उभरी है। दरअसल, ‘वर्ल्ड लीक्स’ नाम से कुख्यात एक साइबर अपराधी गिरोह ने दावा किया कि उसने संयंत्र से संबंधित उन्नीस हजार से ज्यादा संवेदनशील फाइलें ‘डार्क वेब’ पर जारी कर दी हैं।
ज्यादा चिंता की बात यह है कि जारी दस्तावेजों को चोरी हुए डेटा की आठ लाख अट्ठावन हजार फाइलों का महज एक हिस्सा बताया गया है। जाहिर है, यह घटना देश की परमाणु ऊर्जा से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण अवसंरचना के साइबर सुरक्षा तंत्र के मजबूत होने के दावों पर एक सवालिया निशान है। इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद गंभीर घटना माना जा रहा है। हालांकि खबरों के मुताबिक, चोरी हुए डेटा में परमाणु संयंत्र के मुख्य तंत्र की रूपरेखा शामिल नहीं है, लेकिन जो ब्योरे उड़ाए गए, उनकी वजह से गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
अब भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल और भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम इस मामले की जांच कर रहे हैं, लेकिन यह सवाल उठा है कि जब सबसे संवेदनशील माने जाने वाले संयंत्र की साइबर सुरक्षा में सेंध लगाकर कोई गिरोह इतनी आसानी से डेटा चोरी करके बाकायदा जारी कर दे रहा है, तो किस जगह और हिस्से को सुरक्षित माना जाए।
साइबर हमलों के लिहाज से भारत फिलहाल दुनिया के सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में से एक है। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पिछले वर्ष भारत में 2.89 करोड़ खाते किसी न किसी रूप में साइबर फर्जीवाड़े की जद में आए। विडंबना यह है कि कई बार संस्थानों को अपने तंत्र में हुए साइबर हमलों के बारे में पता भी नहीं चल पाता। ऐसे में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र में हुए साइबर हमले की गंभीरता समझी जा सकती है।
पिछले कुछ समय से देश की महत्त्वपूर्ण अवसंरचनाओं पर साइबर हमलों में जैसी तेजी दर्ज की गई है, उससे साफ है कि जिस रफ्तार से हर स्तर पर डिजिटलीकरण हो रहा है, उसी अनुपात में सुरक्षा इंतजामों का जाल तैयार नहीं किया जा रहा है। खासतौर पर साइबर अपराधों में जब से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का इस्तेमाल बढ़ा है, तब ऐसे हमलों से निपटना भी जटिल हुआ है।
