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हादसे की आतिश

केरल के कोल्लम में आतिशबाजी प्रतियोगिता के दौरान पुत्तिंगल मंदिर में हुए भयानक हादसे से एक बार फिर यही जाहिर हुआ है कि जिन मामलों में प्रशासन को कड़ी सतर्कता बरतनी चाहिए, उन्हें वह आस्था और जनभावनाओं का मामला मान कर आंखें बंद कर लेता है। पुत्तिंगल मंदिर में नववर्ष का उत्सव मनाया जा रहा […]

Author नई दिल्ली | Published on: April 11, 2016 12:18 AM
Kollam fire tragedy, Kollam Temple tragedy, Kollam Temple Fire, Sachin Tendulkar, Sachin Tendulkar Tweetकोल्लम के समीप परवूर में पुत्तिंगल देवी मंदिर में रविवार (10 अप्रैल) को उत्सव के दौरान पटाखों और आतिशबाजी से हुए इस हादसे में अब तक करीब 102 लोगों की मौत हो चुकी है। (पीटीआई फोटो)

केरल के कोल्लम में आतिशबाजी प्रतियोगिता के दौरान पुत्तिंगल मंदिर में हुए भयानक हादसे से एक बार फिर यही जाहिर हुआ है कि जिन मामलों में प्रशासन को कड़ी सतर्कता बरतनी चाहिए, उन्हें वह आस्था और जनभावनाओं का मामला मान कर आंखें बंद कर लेता है। पुत्तिंगल मंदिर में नववर्ष का उत्सव मनाया जा रहा था। इस अवसर पर आतिशबाजी की प्रतियोगिता आयोजित थी। इसलिए आतिशबाजी देखने और नवरात्र के चलते पूजा-पाठ के लिए मंदिर में हजारों लोग पहुंचे थे। रविवार सुबह तड़के आतिशबाजी के दौरान कोई चिनगारी छिटक कर मंदिर के भंडार घर में रखे पटाखों के ढेर पर जा पड़ी और भयानक विस्फोट हो गया। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि मंदिर की इमारत का एक हिस्सा ढह गया, आसपास आग और धुएं का गुबार भर गया।

इसमें सौ से ऊपर लोगों की जान चली गई और साढ़े तीन सौ से ऊपर लोगों के झुलसने की वजह से हालत गंभीर बनी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष सहित कई नेताओं ने घटनास्थल का दौरा किया। मामले की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए गए हैं, पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे की घोषणा भी कर दी गई है। जिला प्रशासन का कहना है कि उसने आतिशबाजी की इजाजत नहीं दी थी। इसलिए मंदिर प्रशासन के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। मगर इससे न तो प्रशासन की लापरवाही कम हो जाती है और न मंदिरों, तीर्थस्थलों आदि पर होने वाले ऐसे हादसों पर रोक लगने का कोई भरोसा पैदा होता है। सवाल है कि अगर प्रशासन की इजाजत के बगैर इतने बड़े पैमाने पर आतिशबाजी होती रही, तो उसी वक्त उसने कड़ी कार्रवाई करना उचित क्यों नहीं समझा। अब मंदिर प्रशासन के खिलाफ मामला दर्ज करके क्या हासिल होगा।

यह पहली बार नहीं था, जब नए साल के मौके पर पुत्तिंगल मंदिर में आतिशबाजी की प्रतियोगिता आयोजित की गई। यह सिलसिला अनेक सालों से चला आ रहा है। इसे रोकने के लिए मंदिर के आसपास रहने वाले कुछ लोगों ने अदालत में गुहार भी लगाई थी। मगर इस दिशा में कोई व्यावहारिक उपाय नहीं किया गया, तो दोष आखिर किसका माना जाना चाहिए। उपासना स्थलों और तीर्थस्थानों पर मामूली लापरवाही, भगदड़ आदि के चलते कई बार बड़े हादसे हो चुके हैं, फिर भी प्रशासन ऐसे मौकों पर जरूरी एहतियात बरतने में लापरवाही करता है, तो इसे चूक नहीं कहा जा सकता। आम लोग आस्था के चलते बहुत सारी कुरीतियों को रिवाज के रूप में स्वीकार कर लेते हैं।

पुत्तिंगल मंदिर में आतिशबाजी भी उन्हीं में से एक है। फिर यह भी आम बात है कि मंदिरों, तीर्थस्थलों आदि पर होने वाले आयोजनों में भीड़ को संभालने, संभावित हादसों से निपटने वगैरह की जिम्मेदारी प्रशासन प्राय: आयोजकों पर छोड़ देता है। पुत्तिंगल मंदिर में भी यही हुआ। चूंकि प्रशासन ने इस आयोजन की इजाजत नहीं दी थी, इसलिए वहां दमकल की गाड़ियों, चिकित्सा सेवाओं आदि की तैनाती नहीं थी। सवाल है कि प्रशासन ने जब आतिशबाजी की इजाजत नहीं दी थी तो क्यों उसने उसे रोकने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए। सुबह तक आतिशबाजी होती रही और वह क्यों अपनी आंख और कान बंद किए बैठा रहा। हैरानी की बात है कि पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले लोग भी इसे रोकने के लिए आगे नहीं आए। जब तक आस्था के नाम पर प्रशासनिक चुप्पी बनी रहेगी, ऐसे हादसों को रोकना मुश्किल होगा।

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