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संपादकीयः ताक पर कानून

उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के मुकुंदपुर इलाके में सोमवार देर रात एक नाबालिग लड़के को लोगों ने चोर होने के शक में जिस कदर पीट-पीट कर मार डाला, उससे फिर यही पता चलता है कि समाज के भीड़ में तब्दील होने की प्रक्रिया किस खतरनाक गति से तेज हो रही है।

उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के मुकुंदपुर इलाके में सोमवार देर रात एक नाबालिग लड़के को लोगों ने चोर होने के शक में जिस कदर पीट-पीट कर मार डाला, उससे फिर यही पता चलता है कि समाज के भीड़ में तब्दील होने की प्रक्रिया किस खतरनाक गति से तेज हो रही है। सोलह वर्षीय लड़के पर आरोप था कि वह एक घर में चोरी कर रहा था, तभी वहां मौजूद तीन भाइयों ने उसे पकड़ लिया और चोर-चोर का शोर मचा कर आसपास के लोगों को इकट्ठा कर लिया। फिर सबने मिल कर पिटाई की, जिससे उसकी मौत हो गई। सवाल है कि अगर लड़का चोरी के मकसद से घर में घुसा था और पकड़ा गया तो वहां मौजूद लोगों के जेहन में उसे पुलिस को सौंपने का खयाल क्यों नहीं आया! अगर उसने वास्तव में अपराध किया था तो कानून उसके लिए सजा निर्धारित करेगा। अराजक हो गए लोग अगर उसे पकड़ कर पीटते हुए मार डालते हैं तो वे भी कानूनन अपराध ही करते हैं। लेकिन लोगों को कानून-व्यवस्था का यह बुनियादी पहलू समझना जरूरी नहीं लग रहा है।

किसी भी अपराध की स्थिति में सामान्य प्रक्रिया है कि सबसे पहले पुलिस को सूचना देकर घटनास्थल पर बुलाएं। उसके बाद एक तयशुदा कानूनी प्रक्रिया के तहत मामले को फैसले के अंजाम तक पहुंचाया जाता है। एक साधारण समझ रखने वाला व्यक्ति भी इस प्रक्रिया से वाकिफ होता है। लेकिन इसके बजाय अगर लोग बिना सोचे-समझे महज शक के आधार पर पकड़े गए किसी व्यक्ति को क्रूर तरीके से यातना देते और मार डालते हैं तो यह किस सामाजिक स्थिति का परिचय देता है? दिल्ली में चोरी के शक में नाबालिग को मार डालने की घटना ऐसा कोई अकेला उदाहरण नहीं है। पिछले कुछ समय से लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जिनमें कहीं बच्चा चोरी तो कहीं गोहत्या के शक में भीड़ ने किसी को पकड़ा और उसे पीट-पीट कर मार डाला। दरअसल, किसी शक या अफवाह की जद में आए लोग भीड़ में तब्दील हो जाते हैं और उसके बाद उन्हें न तो सच जानने की फिक्र होती है, न कानूनी तकाजों का खयाल रखना जरूरी लगता है। ऐसे में कानून के शासन की अवधारणा और व्यवस्था का हनन होता है और यह किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है।

विडंबना है कि पहले के मुकाबले अफवाहों और फर्जी खबरों के फैलने की गति बेहद तेज हो चुकी है और आज झूठ की आग फैलने का सबसे बड़ा जरिया वाट्सऐप और सोशल मीडिया के अलग-अलग मंच हो चुके हैं। किसी भी फैलाई गई खबर की पुष्टि करना लोग जरूरी नहीं समझते और उसके असर में खुद को हिंसक भीड़ का हिस्सा बन जाने देते हैं, जिसके बाद किसी भी बात को समझने की उनकी क्षमता खत्म हो जाती है। फिर वे वही करते हैं, जो वहां मौजूद सारे लोग कर रहे होते हैं। यह समझना मुश्किल है कि सामान्य स्थितियों में खुद को सभ्य, समझदार और संवेदनशील इंसान मानने वाले लोग कैसे किसी झूठ या अफवाह से संचालित होने लगते हैं! क्या यह लोगों के भीतर गहरे पैठी कुंठाओं की हिंसक अभिव्यक्ति है? जबकि ऐसी कुंठाएं किसी भी व्यक्ति के विवेक और उसकी संवेदना को कठघरे में खड़ा करती हैं। इक्कीसवीं सदी में जब हम एक परिपक्व लोकतांत्रिक समाज होने का दावा कर रहे हैं, उसमें ऐसी घटनाएं हमारे सामाजिक विकास पर सवालिया निशान लगाती हैं!