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संपादकीय : किडनी का कारोबार

दिल्ली में किडनी कारोबार से जुड़े गिरोह के भंडाफोड़ से एक बार फिर यही साबित हुआ है कि इस गैरकानूनी धंधे में किस तरह बड़े डॉक्टरों से लेकर पांच सितारा कहे जाने वाले अस्पताल तक शामिल हैं।

Author नई दिल्ली | June 7, 2016 12:10 AM
नई दिल्ली का अपोलो अस्पताल

दिल्ली में किडनी कारोबार से जुड़े गिरोह के भंडाफोड़ से एक बार फिर यही साबित हुआ है कि इस गैरकानूनी धंधे में किस तरह बड़े डॉक्टरों से लेकर पांच सितारा कहे जाने वाले अस्पताल तक शामिल हैं। हालांकि ताजा मामला महज संयोग से तब सामने आया जब एक महिला अपने पति से सड़क पर बहस कर रही थी और कुछ पुलिसकर्मियों के दखल देने पर किडनी के कारोबार और उसके लिए मिलने वाली रकम की बात सामने आई।

उसके बाद पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ाया और उसमें स्थानीय दलाल से लेकर अपोलो जैसे मशहूर अस्पताल के कुछ डॉक्टर तक लिप्त पाए गए। अब कुछ लोगों की गिरफ्तारी हुई है, लेकिन क्या संगठित तौर पर परदे के पीछे से यह अवैध कारोबार चलाने वालों तक पुलिस पहुंच पाएगी? खबरों के मुताबिक एक किडनी के लिए ग्राहक से पच्चीस से तीस लाख रुपए वसूले जाते थे, लेकिन किडनी देने वाले को सिर्फ एक-डेढ़ लाख रुपए मिलते थे। सवाल है कि अगर इस अस्पताल में किडनी का कारोबार हो रहा था, तो क्या इसकी जानकारी प्रबंधन और उसके उच्च अधिकारियों को नहीं थी?

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जिन अस्पतालों में इलाज से लेकर लेन-देन तक की हर गतिविधि पर प्रबंधन की निगाह होती है, उसमें किसी मरीज को किडनी की जरूरत, उसके लिए किडनी का इंतजाम, दाता का ब्योरा, आॅपरेशन, प्रत्यारोपण, पैसे के लेन-देन वगैरह क्या ऐसी गतिविधियां हैं, जिन्हें चोरी-छिपे अंजाम दिया जा सकता है? ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहे हैं, जिनमें स्थानीय स्तर पर काम करने वाले दलाल और उनसे जुड़े कई डॉक्टर दूरदराज के इलाकों से गरीब लोगों को फंसा कर शहरों के जाने-माने अस्पतालों तक लाते हैं और उन्हें मामूली रकम देकर उनकी किडनी निकाल कर ऊंची कीमत पर बेच देते हैं।

अब अगर इतने सुव्यवस्थित और पांच सितारा कहे जाने वाले अस्पतालों में भी कानून और नियम-कायदों को ताक पर रख कर ऐसे काम किए जाते हैं, तो बाकी जगहों के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है। करीब तीन साल पहले दिल्ली से सटे गुड़गांव में एक बड़े किडनी रैकेट का खुलासा हुआ था, जिसमें लगे दो डॉक्टरों के धंधे का दायरा दस से ज्यादा देशों तक फैला था और उसके लिए पांच सौ से ज्यादा एजेंट काम कर रहे थे, जो एक ओर विदेशों से किडनी के मरीजों को लाते थे तो दूसरी ओर गांव या शहरों में बेहद गरीबी में जीने वाले लोगों को मामूली चीरा लगाने के बदले बीस से पचास हजार रुपए मुहैया कराने का भरोसा देकर फंसाते थे।

अंगों की जरूरत के मद्देनजर संबंधित कानूनों में अब अंगदान की प्रक्रिया को कुछ आसान बनाया गया है। लेकिन हमारे देश में कई तरह के पूर्वाग्रहों के चलते लोग अंगदान के लिए उत्साहित नहीं होते। यही वजह है कि जितने बड़े पैमाने पर अंगों के प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है, उसके अनुपात में बहुत कम अंग उपलब्ध हो पाते हैं। लेकिन इसमें गरीबी और अभाव एक ऐसा पहलू है, जो किसी लाचार व्यक्ति को कुछ पैसों की उम्मीद में अपनी किडनी बेचने पर मजबूर करता है। इसी का फायदा पच्चीस या तीस लाख रुपए की कमाई करने वाले डॉक्टर और अस्पताल उठाते हैं। मुश्किल यह भी है कि निजी अस्पतालों से लेकर डॉक्टरों की गतिविधियों पर निगरानी का तंत्र इतना कमजोर है कि इस पेशे की सामान्य गड़बड़ियां भी नहीं पकड़ी जा पातीं। कन्या भ्रूणहत्या का बेलगाम तरीके से आज भी जारी रहना इसका उदाहरण है।

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