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परंपरा बनाम अधिकार

केरल के सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म के आयुवर्ग की महिलाओं का प्रवेश वर्जित होने की परिपाटी को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद एक बार फिर ताजा हो गया है..

Author नई दिल्ली | Published on: January 13, 2016 12:04 AM
उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट)

केरल के सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म के आयुवर्ग की महिलाओं का प्रवेश वर्जित होने की परिपाटी को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद एक बार फिर ताजा हो गया है। वकीलों के एक संगठन की तरफ से याचिका के जरिए इस प्रतिबंध को चुनौती दी गई थी। सर्वोच्च अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि संविधान के तहत ऐसा नहीं किया जा सकता; मंदिर धार्मिक आधार पर तो प्रवेश पर पाबंदी लगा सकते हैं, मगर लैंगिक आधार पर नहीं। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है, पर उसका रुख संवैधानिक आधार वाले उसके तर्क से जाहिर हो गया है। दरअसल, मंदिरों में प्रवेश के ऐसे नियम तब बने या विकसित हुए थे, जब कानून, संविधान, नागरिक अधिकार आदि सार्वजनिक जीवन के निर्धारक तत्त्व नहीं थे। पर ये आज के जमाने की अहम कसौटियां हैं। इसलिए इनके और समाज की अनेक रूढ़ियों के बीच द्वंद्व खड़ा हो जाता है। मंदिरों में प्रवेश से संबंधित कई पुराने नियम या प्रतिबंध इतिहास की चीज हो गए, कुछ ढीले पड़ गए और कुछ कहीं-कहीं कायम हैं। केरल के सबरीमाला मंदिर में दस से पचास साल की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी चली आ रही है। इसके पीछे दलील या मान्यता यह है कि मासिक धर्म के आयुवर्ग की महिलाओं के गर्भगृह तक जाने से वह अपवित्र हो जाएगा। इसे केरल में हिदू धर्मस्थलों से संबंधित 1965 में बने एक कानून का भी समर्थन हासिल रहा है। इसी आधार पर केरल उच्च न्यायालय ने 1991 में प्रतिबंध को सही ठहराया था। पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी इस बात का संकेत है कि प्रतिबंध को राज्य के कानून से मिला कवच छिन सकता है।

प्रतिबंध निर्बाध रूप से चलता रहा, तो इसकी एक प्रमुख वजह यही है कि खुद स्त्रियों ने इसे चुपचाप स्वीकार कर रखा था। पर बड़ी संख्या में महिलाएं अब इसे भेदभाव के रूप में देखती हैं और इसके खिलाफ आवाज उठा रही हैं। जानी-मानी कन्नड़ अभिनेत्री जयमाला ने यह दावा करके विवाद खड़ा कर दिया था कि 1987 में वे सबरीमाला में गर्भगृह तक चली गई थीं और मूर्ति को स्पर्श भी किया था। उनके इस दावे के बाद पुजारियों ने मंदिर धोकर ‘अपवित्रीकरण’ दूर हो जाने का भरोसा दिलाया। यही पिछले साल नवंबर में महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शनि शिंगणापुर मंदिर में हुआ। इस मंदिर में भी महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध है। पर एक महिला ने वहां घुस कर और पूजा-अर्चना कर परिपाटी को चुनौती देने की कोशिश की। इस घटना के बाद यहां भी मंदिर धोया गया। यह दिलचस्प है कि अब एक महिला को इस मंदिर के न्यास का प्रमुख बना दिया गया, पर महिलाओं के प्रवेश पर चली आ रही पाबंदी कायम है। सबरीमाला में चले आ रहे प्रतिबंध को कानून के समक्ष समानता और धार्मिक आजादी सुनिश्चित करने वाले संविधान के अनुच्छेदों के तहत चुनौती दी गई है। एक दौर द्वंद्व का आता है और दो विरोधी धाराओं की टकराहट दिखती है। पर परंपराएं समय के साथ बदलती हैं, अपने को नवीकृत भी करती हैं। सबरीमाला के मामले में सर्वोच्च अदालत के रुख ने इसी की उम्मीद बंधाई है।

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