ताज़ा खबर
 

संपादकीयः माकपा का हासिल

केरल में इस बार वाम मोर्चे ने जर्बदस्त जीत हासिल की है। पर केरल की उपलब्धि की चमक बंगाल के नतीजों ने फीकी कर दी। बंगाल में लगातार चौंतीस साल तक राज कर चुके वाम मोर्चे को इस बार मिली पराजय अपूर्व है।

Author May 21, 2016 02:39 am
बीजेपी और कांग्रेस।

केरल में इस बार वाम मोर्चे ने जर्बदस्त जीत हासिल की है। पर केरल की उपलब्धि की चमक बंगाल के नतीजों ने फीकी कर दी। बंगाल में लगातार चौंतीस साल तक राज कर चुके वाम मोर्चे को इस बार मिली पराजय अपूर्व है। तृणमूल के हाथों सत्ता गंवाने के बाद माकपा विपक्ष की नंबर एक पार्टी थी। पर इस चुनाव में वह खिसक कर तीसरे नंबर पर पहुंच गई। बंगाल में विपक्ष में पहला स्थान अब कांग्रेस का है जिसे दो सौ चौरानवे सदस्यों वाली विधानसभा में चौवालीस सीटें हासिल हुई हैं। वाम मोर्चे के हिस्से में तैंतीस सीटें आई हैं; जिनमें माकपा की छब्बीस सीटें हैं। जाहिर है, यह वाम मोर्चे की ऐतिहासिक पराजय है, जिसका अनुमान चुनावी पंडितों को भी शायद नहीं था।

सारे सर्वेक्षण और अनुमान इस मायने में तो सही साबित हुए कि ममता बनर्जी की वापसी होने जा रही है, पर किसी ने नहीं कहा होगा कि वाम मोर्चे को कांग्रेस से भी कम सीटें हासिल होंगी। यह चुनाव माकपा ने कांग्रेस के साथ तालमेल कर लड़ा था; इसमें कांग्रेस ही कनिष्ठ साझेदार थी। फिर भी वाम मोर्चे को कांग्रेस से अठारह सीटें कम मिलना एक हैरतनाक नतीजा है। इस पहेली की कुंजी यह है कि वाम मोर्चे के समर्थक कहीं अधिक प्रतिबद्ध होते हैं। वाम मोर्चे ने तो अपने समर्थकों के वोट कांग्रेस को दिलवा दिए, पर कांग्रेस अपने वोट वाम मोर्चे को नहीं दिलवा सकी। पर कांग्रेस से तालमेल की जरूरत वाम मोर्चे ने महसूस की, यह अपने आप में उसकी लगातार गिरती सेहत का सूचक है। रणनीतिक विफलता तो जाहिर है, सैद्धांतिक रूप से भी इस पर सवाल उठे हैं।

पार्टी के भीतर एक धड़ा पहले से इस तालमेल के खिलाफ माना जा रहा था, पर शायद इसके पीछे पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी की पहल होने के कारण खामोश था। अब खामोशी टूट सकती है और तालमेल के फैसले पर मतभेद अगर सार्वजनिक रूप से नहीं, तो पार्टी-मंचों पर मुखर रूप से सामने आ सकते हैं। अलबत्ता नतीजा कुछ और होता, तो सैद्धांतिक सवाल उठने की संभावना न रहती, क्योंकि कांग्रेस या अन्य किसी ‘बूर्जुआ’ पार्टी से माकपा के तालमेल का यह पहला या अकेला मामला नहीं है। मसलन, माकपा तमिलनाडु में द्रमुक-कांग्रेस के गठबंधन में शामिल थी; इसी तरह 2004 में आंध्र प्रदेश में वह कांग्रेस और टीआरएस के गठजोड़ में साझेदार थी।

बहरहाल, बंगाल में जहां माकपा से मुख्य विपक्षी पार्टी होने का दर्जा छिन गया है, वहीं बंगाल की भारी पराजय का नुकसान उसे राष्ट्रीय राजनीति में भी उठाना होगा। राष्ट्रीय पार्टी होने की माकपा की मान्यता पर भी खतरा मंडरा रहा है। लोकसभा चुनाव की कसौटी पर राष्ट्रीय पार्टी की पात्रता वह पहले ही गंवा चुकी है। विधानसभा चुनावों यानी कम से कम चार राज्यों में प्रति तीस में से न्यूनतम एक सीट पाने की शर्त पर भी अब वह विफल साबित हुई है। क्षेत्रीय पार्टियों के मेल-मिलाप से केंद्र में तीसरा मोर्चा बनाने की जब भी कवायद होती थी, उसमें माकपा की भूमिका या राय को हमेशा तवज्जो मिलती थी। लेकिन अब इस तरह की कोई कोशिश होगी, तो जयललिता और ममता बनर्जी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App