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संपादकीय: आतंक का जवाब

कश्मीर में पिछले कुछ महीनों में आतंकवादियों ने जिस तरह से राजनीतिक लोगों और कार्यकर्ताओंं को निशाना बनाना शुरू कर किया था, उसे देखते हुए केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन के लिए इन चुनावों को शांतिपूर्ण संपन्न कराना एक बड़ी चुनौती बन गई थी। लेकिन जिस तरह से लोग घरों से बाहर आकर बेखौफ मतदान कर रहे हैं, वह कश्मीर के लिए एक नई सुबह की शुरुआत है।

संपादकीयकश्मीर में वोट डालने के लिए कतार में लगीं महिलाएं। (फाइल फोटो)

जम्मू-कश्मीर में इन दिनों चल रहे जिला विकास परिषद (डीडीसी) के चुनावों में जिस उत्साह और जोश के साथ लोग मतदान कर रहे हैं, वह घाटी में आतंकवाद फैलाने वालों को कड़ा जवाब है। वोट डालने के लिए घरों से बाहर निकल रहे लोगों ने अब यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वे घाटी में आतंकवाद का खात्मा चाहते हैं। प्रदेश में डीडीसी चुनाव के लिए अब तक मतदान के पांच चरण पूरे हो चुके हैं और दूसरे चरण को छोड़ कर सभी चरणों में मतदान का प्रतिशत पचास के ऊपर रहा है।

हालांकि दूसरे चरण में भी अड़तालीस प्रतिशत से ज्यादा वोट पड़े थे। आतंकग्रस्त इलाकों में मतदान केंद्रों पर लोगों की न सिर्फ पुरुषों, बल्कि महिलाओं की भी लंबी-लंबी कतारें इस बात का प्रमाण हैं कि राजनीतिक गतिविधियों को बड़े पैमाने पर जनता की स्वीकार्यता मिल रही है। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 को निष्प्रभावी किए जाने के बाद यह पहला मौका है जब स्थानीय स्तर पर चुनावों की शुरुआत से राजनीतिक गतिविधियों ने जोर पकड़ा है।

कश्मीर में पिछले कुछ महीनों में आतंकवादियों ने जिस तरह से राजनीतिक लोगों और कार्यकर्ताओंं को निशाना बनाना शुरू कर किया था, उसे देखते हुए केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन के लिए इन चुनावों को शांतिपूर्ण संपन्न कराना एक बड़ी चुनौती बन गई थी। लेकिन जिस तरह से लोग घरों से बाहर आकर बेखौफ मतदान कर रहे हैं, वह कश्मीर के लिए एक नई सुबह की शुरुआत है।

कश्मीर पिछले तीन दशकों से भी ज्यादा समय से आतंकवाद से जूझता रहा है। इससे पहले भी घाटी में जिस तरह की राजनीति चलती रही और सरकारें आती-जाती रहीं, उससे स्थानीय जनता को कोई लाभ नहीं पहुंचा, बल्कि वहां के राजनीतिक दलों की स्वार्थपरक राजनीति के कारण पड़ोसी देश पाकिस्तान का कश्मीर में दखल तेजी से बढ़ता गया। इसी का नतीजा था कि कश्मीर समस्या के नाम पर घाटी में अलगाववादी गुटों की राजनीति भी चरम पर पहुंच गई थी।

इसमें कोई संदेह नहीं कि घाटी के अलगाववादी गुट पाकिस्तान के इशारे पर ही चलते आए। पाकिस्तान से उन्हें पैसे से लेकर हर तरह की भरपूर मदद मिलती रही। परिणाम यह हुआ कि पिछले तीस सालों में कश्मीर घाटी आतंकवादियों के गढ़ में तब्दील हो गई। लेकिन अब पाकिस्तान से लेकर अलगाववादी गुट और स्थानीय राजनीतिक दल अच्छी तरह से समझ चुके हैं कि आम जनता को लंबे समय तक अंधेरे में रख कर अपनी दुकान नहीं चलाई जा सकती।

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि आतंकवाद के कारण कश्मीर को हर तरह से भारी नुकसान पहुंचा है। प्रदेश में उद्योग-धंधे चौपट हुए, बेरोजगारी बढ़ी, आए दिन के बंद और हिंसा के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं का ढांचा चरमरा गया और राज्य न सिर्फ आर्थिक बदहाली की ओर जाता रहा, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी भारी नुकसान पहुंचा। प्रदेश में बढ़ती बेरोजगारी के कारण ही आतंकवादी संगठन स्थानीय नौजवानों को भटकाने में कामयाब होते रहे और गावों में पैठ जमाते गए। आज सुरक्षाबलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ग्रामीण इलाकों में आतंकी संगठनों की पैठ को खत्म करने की है।

अब कश्मीर को आगे ले जाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि सरकार, प्रशासन और राजनीतिक प्रक्रिया में लोगों का भरोसा पैदा हो, जैसा कि डीडीसी चुनावों में नजर भी आ रहा है। तभी लोग विकास की धारा से जुड़ पाएंगे। घाटी में स्थानीय स्तर पर राजनीतिक प्रक्रिया से विकास के बुनियादी कामों को भी गति मिलेगी। वहां अगर अमन-चैन कायम होगा तो नए काम-धंधे भी शुरू होंगे और नौजवानों को रोजगार भी मिलेगा। शांति और विकास की यह नई इबारत ही आतंकवाद का मुंहतोड़ जवाब होगी।

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