अदालत में हत्या

दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत में हुई हत्या के चलते राजधानी की कानून-व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में खड़ी हो गई है। खासकर अदालतों के सुरक्षा-इंतजामों को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं..

Author नई दिल्ली | Updated: December 25, 2015 1:08 AM
फायरिंग के बाद कड़कड़डुमा कोर्ट परिसर में जुटी भीड़, (इनसेट में दिल्ली पुलिस का हेड कॉन्सटेबल, जिसकी मौत हो गई)

दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत में हुई हत्या के चलते राजधानी की कानून-व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में खड़ी हो गई है। खासकर अदालतों के सुरक्षा-इंतजामों को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। अदालत परिसर में या किसी कक्ष में कहा-सुनी, मार-पीट और हाथापाई के बहुत-से वाकये गिनाए जा सकते हैं, पर हथियारों से लैस बदमाशों का अदालत में घुस आना और जज के सामने कठघरे में खड़े विचाराधीन कैदी पर अंधाधुंध गोलियां चलाना और बचाव में आए कांस्टेबल को मार डालना, ऐसी खौफनाक वारदात शायद ही पहले कभी हुई हो। इस घटना में एक गोली जज के पास से भी निकली, जिसमें वे बाल-बाल बच गए। जाहिर है, जो हुआ वह अदालत की सुरक्षा-व्यवस्था में घोर लापरवाही की ओर ही इशारा करता है। आखिर हथियारों समेत कई लोग अदालत में कैसे दाखिल हुए? उनमें से कोई भी तलाशी या जांच में क्यों नहीं पकड़ा जा सका, इस सवाल का पुलिस के पास कोई जवाब नहीं है।

पुलिस भले दावा करती रही हो कि अदालतों की सुरक्षा-व्यवस्था चाक-चौबंद है, पर पिछले तीन साल में इसमें सेंध लगाने वाली कई घटनाएं हुई हैं। फरवरी 2013 में दिल्ली की रोहिणी अदालत के अंदर एक विचाराधीन कैदी की गोली मार कर हत्या कर दी गई। पिछले साल तीस जनवरी को इसी अदालत के एक गेट के समीप एक गवाह पर गोली चलाई गई। पिछले साल मई में पुलिस ने एक गिरोह के दस बदमाशों को पिस्तौल के साथ इसी अदालत से गिरफ्तार किया था, जो एक दूसरे बदमाश को मारने के इरादे से घुसे थे। ताजा वारदात जेल-व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा करती है। इस घटना की योजना जेल में बनी थी और इसके मूल में दो आपराधिक गिरोहों की लड़ाई है। तिहाड़ जेल में बंद एक सरगना ने अपने प्रतिद्वंद्वी को, जो कई संगीन मामलों में आरोपी है, खत्म करने के इरादे से ‘सुपारी’ दी थी।

सवाल है कि जेल में बंद रहने के दौरान भी अपराधी अपनी गतिविधियां कैसे जारी रख पाते हैं? यह जेल के भीतर फौरी उत्तेजना में लड़ाई-झगड़े का मामला नहीं है बल्कि जेल में बैठे-बैठे अदालत में पेशी के दौरान एक विचाराधीन कैदी की हत्या के लिए भाड़े के हमलावरों को भेजने का है। जेल के नियम-कायदों के उल्लंघन और नाजायज छूट मिले बिना यह कैसे हो सकता था? खबर है कि कड़कड़डूमा अदालत में हुई वारदात के सभी चारों आरोपी नाबालिग हैं। ऐसा लगता है कि इस वारदात की साजिश रचने वालों और हमलावरों के तौर पर चुने गए नाबालिग बदमाशों, दोनों के दिमाग में यह बात रही होगी कि किशोर न्याय कानून के तहत कम सजा मिलेगी। यह घटना ऐसे समय हुई है जब एक दिन पहले ही किशोर न्याय कानून में संशोधन का विधेयक राज्यसभा से भी पारित हो गया। लोकसभा ने इसे मई में ही पारित कर दिया था। इस विधेयक के तहत हत्या और बलात्कार जैसे संगीन मामलों में किशोर माने जाने की उम्र-सीमा अठारह वर्ष से घटा कर सोलह वर्ष करने का प्रावधान है। संशोधन की आलोचना करने वालों के पास तथ्यों और तर्कों की कमी नहीं है। पर कड़कड़डूमा अदालत में हुई वारदात ने संशोधन के पक्ष को बल दिया है।

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