Women Safety: महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की सुनवाई और फैसले की दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि न्यायालय में पीड़िता के पक्ष पर कितनी संजीदगी के साथ गौर किया गया। खासतौर पर हमारे देश में बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के मामले में न केवल इस अपराध की प्रकृति, बल्कि उसका पीड़िता के मन-मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखते हुए बेहद संवेदनशील रुख अपनाने की जरूरत होती है, लेकिन कई बार इन तकाजों को प्राथमिक नहीं माना जाता।

मगर अब सर्वोच्च न्यायालय ने इस संदर्भ में एक जरूरी मानक सामने रखा है कि निचली अदालतों में बलात्कार के मामलों पर सुनवाई करते हुए कितना संवेदनशील होने की जरूरत है! गौरतलब है कि पिछले वर्ष मार्च में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में एक नाबालिग लड़की पर यौन इरादे से शारीरिक बलप्रयोग को बलात्कार के प्रयास का अपराध नहीं माना और आरोपों को हल्का करार दिया। उस समय भी अदालत के रुख और उसकी टिप्पणियों पर तीखे सवाल उठे थे।

अब सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, उससे एक बार फिर महिलाओं की गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायिक व्यवस्था के प्रति भरोसा मजबूत हुआ है। दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संबंधित मामले में बलात्कार से संबंधित कानून के प्रावधानों की विचित्र व्याख्या करके आरोपियों के प्रति जिस तरह नरम रुख अख्तियार किया था, वह अपने आप में न्याय की प्रक्रिया पर एक गंभीर सवाल था।

खासतौर पर एक नाबालिग लड़की पर तीन युवकों के शारीरिक बलप्रयोग, बदतमीजी और उसकी गरिमा को चोट पहुंचाने की जिस स्तर पर अनदेखी की गई और आरोप की गंभीरता को कम किया गया, उस पर खुद सुप्रीम कोर्ट ने भी गहरी नाराजगी जताई थी। बीते वर्ष 25 मार्च को शीर्ष अदालत की पीठ ने साफ शब्दों में कहा था कि यह फैसला पूरी तरह से असंवेदनशील और अमानवीय नजरिए को दिखाता है, इसलिए इस पर रोक जरूरी है। अब उसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को फटकार लगाई और उसके विवादित फैसले को पलटते हुए नाबालिग लड़की से की गई हरकत को ‘बलात्कार का प्रयास’ करार दिया।

अब यह मुकदमा गंभीर अपराध और पाक्सो अधिनियम के सख्त प्रावधानों के तहत चलेगा। निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट का यह रुख महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों की रोकथाम और खासतौर पर अदालतों में बलात्कार जैसे गंभीर अपराध की सुनवाई के क्रम में कभी-कभार बरती जाने वाली असंवेदनशीलता के मद्देनजर बेहद अहम है। सवाल है कि ऐसे मामलों में कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करते हुए अपराध की प्रकृति, पीड़िता की स्थिति और सामाजिक हकीकतों को ध्यान में रखना जरूरी क्यों नहीं समझा जाता!

जब भी अदालतों की ओर से ऐसे मामलों में जरूरी संवेदनशीलता के तकाजों की अनदेखी की जाती है, तब यौन अपराधों के विरुद्ध महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के प्रयास कमजोर होते हैं। शायद इन्हीं वजहों से सुप्रीम कोर्ट ने अब यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों के संदर्भ में न्यायाधीशों के दृष्टिकोण और न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता तथा करुणा पैदा करने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को एक समिति गठित करने को कहा है।

यह इसलिए भी जरूरी पहल है कि न्याय की उम्मीद तभी पूरी हो सकती है, जब न्यायाधीशों के भीतर पीड़ित की वास्तविक स्थितियों के प्रति जरूरी संवेदनशीलता, करुणा और समझ की भावना हो।

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घर से लेकर कार्यस्थल तक और यहां तक कि सार्वजनिक जगहों पर भी कुछ लोग स्त्रियों की गरिमा और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने से बाज नहीं आते। नैतिक और सामाजिक मूल्यों की इस गंभीर क्षति को रोकने का प्रयास कम ही दिखता है। मगर पिछले दिनों दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित संगीत कार्यक्रम में महिलाओं को परेशान किए जाने की घटना को पंजाबी गायिका जैस्मीन सैंडलस ने गंभीरता से लिया। पढ़िए पूरी खबर…