देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग मसलों पर खींचतान एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। असहमति और आलोचना लोकतंत्र की बुनियाद को और ज्यादा मजबूत ही करती है। मगर सभी पक्षों की यह कोशिश होनी चाहिए कि इस द्वंद्व की छाया कम से कम न्यायपालिका पर नहीं पड़े।

विडंबना यह है कि कई बार न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर भी ऐसे टकराव सामने आते हैं, जिससे किसी खास मामले में इससे संबंधित पूरी प्रक्रिया कठघरे में खड़ी होती है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने पंजाब तथा हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अश्वनी कुमार मिश्रा का नाम अधिसूचित किया था। मगर पंजाब सरकार ने यह आरोप लगाया कि केंद्र ने यह कदम राज्य सरकार की राय का इंतजार किए बिना संवैधानिक नियमों तथा तय प्रक्रियाओं को दरकिनार करके उठाया।

इस मसले पर अब केंद्र और पंजाब सरकार आमने-सामने हैं। टकराव की तीव्रता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि रविवार को पंजाब मंत्रिमंडल ने इस नियुक्ति को अधिसूचित करने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ एक प्रस्ताव भी पारित किया।

जाहिर है, इस मसले पर अब यह विवाद खड़ा हो गया है कि क्या इसमें प्रक्रिया संबंधी कोई अनदेखी हुई है। हालांकि केंद्र का यह कहना है कि राज्य सरकार की राय लेना जरूरी है, लेकिन वह बाध्यकारी नहीं है। इसके बाद पंजाब सरकार के विरोध को दरकिनार करते हुए न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा को उनके नए पद पर शपथ दिला दी गई, मगर एक बार फिर न्यायाधीशों की नियुक्ति में केंद्र और राज्य की शक्तियों को लेकर जिस तरह के सवाल खड़े हुए हैं, उन पर स्पष्टता की जरूरत है।

आखिर क्या वजह है कि जहां किसी मामले में केंद्र और राज्य की सहभागिता एक लोकतांत्रिक तकाजा है, वहां कई बार खासतौर पर उन राज्यों की सरकारें खुद को उपेक्षित महसूस करती हैं, जहां विपक्षी दल सत्ता में होते हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में अगर राज्य की कोई भूमिका है, तो उसे महत्त्व देना लोकतंत्र को मजबूती ही देगा। यों भी, इस संबंध में कोई फैसला करते हुए क्या यह ध्यान रखने की जरूरत नहीं है कि किसी राज्य की ओर से संवैधानिक अधिकारों को दबाने का आरोप न लगे या कोई अप्रिय विवाद न खड़ा हो!