झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में अनियमितता के आरोपों के बीच अभ्यर्थियों ने जो विरोध प्रदर्शन शुरू किया था, वह इस संबंध में राज्य सरकार के फैसले के बाद एक तरह से अपने निष्कर्ष पर पहुंच गया लगता है। सरकार ने टीडीपीएल के संचालन में हुई झारखंड कर्मचारी चयन आयोग-संयुक्त स्नातक स्तर (जेएसएससी-सीजीएल) परीक्षा रद्द करने का निर्णय लिया। यह प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों की एक प्रमुख मांग थी।

इसके अलावा, झारखंड लोकसेवा आयोग-14 की परीक्षा रद्द होगी और जेपीएससी ग्यारह से तेरह की भी जांच की जाएगी। साथ ही सरकार ने परीक्षा आयोजित कराने वाली निजी कंपनी टीडीपीएल द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं और उसकी ओर से जारी नतीजों को भी रद्द करने का फैसला किया। इस संदर्भ में झारखंड के मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि राज्य में काम कर रही कई कंपनियां एक बड़े परीक्षा गिरोह में संलिप्त हो गई लगती हैं।

सवाल है कि अगर राज्य सरकार को इस बारे में पहले से भनक थी, तो उसने उस कथित गिरोह की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए जरूरी कदम क्यों नहीं उठाया। फिर सारी स्थितियां स्पष्ट होने के बावजूद विद्यार्थियों का आंदोलन तीन हफ्ते से भी ज्यादा समय तक क्यों खिंचता रहा? सरकार यह कह सकती है कि वह विद्यार्थियों के आंदोलन को लेकर चिंतित थी और उसने समस्याओं से निपटने के लिए झारखंड प्रतियोगी परीक्षा (भर्ती में अनुचित साधनों की रोकथाम और निवारण) अधिनियम लागू कर दिया है।

मगर परीक्षाओं में अनियमितता पर काबू पाने के लिए सारी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद थीं, तो इतने बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां सामने क्यों आईं और विद्यार्थियों को आंदोलन का रास्ता क्यों अख्तियार करना पड़ा? हालांकि परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला सरकार के सकारात्मक और लोकतांत्रिक रुख का संकेत है, लेकिन समूची व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए ठोस नीति और निर्णयों को जमीन पर उतारने की जरूरत पड़ती है।

बहरहाल, झारखंड सरकार के सामने एक नई चुनौती यह सामने आ सकती है कि विद्यार्थियों के विरोध प्रदर्शन के बाद जिस तरह टीडीपीएल के माध्यम से हुए अभ्यर्थियों के चयन को भी रद्द करने का फैसला लिया गया है, अब उससे संबंधित नई जटिलता सामने खड़ी होगी। गौरतलब है कि सरकार का फैसला अमल में आया, तो उसके बाद इन परीक्षाओं के जरिए चयनित 1975 लोगों की नौकरियां खत्म हो जाएंगी और 2014 के बाद से हुई सभी नियुक्ति परीक्षाओं की जांच होगी।

सवाल है कि जितने लोगों की नौकरियां जाने की आशंका है, क्या सरकार उन सभी को अनियमितता का जिम्मेदार या उसमें सहभागी और उसका लाभ लेकर नौकरी हासिल करने वाला मान रही है? अब आगे इस दायरे में आए लोगों की ओर से अगर सरकार के फैसले का विरोध सामने आता है, तब उसे कैसे देखा जाएगा? यह अकेले झारखंड की समस्या नहीं है।

यह विचित्र विडंबना है कि देश भर में एक ओर सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरियों के अवसर धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं और दूसरी ओर इनके लिए आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर अनियमितता के आरोप सामने आ रहे हैं। ऐसे में अगर युवाओं और विद्यार्थियों के बीच असंतोष पैदा होता है, तो यह एक स्वाभाविक स्थिति है। जरूरत इस बात की है कि समय रहते ऐसी ठोस व्यवस्था बने, जिसमें रोजगार के अवसर बढ़ाए जाने के साथ-साथ उसके लिए परीक्षाओं के आयोजन में पारदर्शिता और शुचिता से किसी भी स्तर पर समझौता न हो।