प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे पर दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान विद्यार्थियों के प्रति पुलिस का जो रवैया देखा गया, उसकी वजह से उस पर काफी सवाल उठे। इससे ज्यादा अफसोसनाक और क्या हो सकता है कि एक लोकतांत्रिक विरोध को रोकने की मंशा से पुलिस ने कई स्तर पर बेरहमी की हदें पार कीं और प्रदर्शनकारियों पर इस तरह के बल प्रयोग भी हुए, जिसे किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

मसलन, लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले और पानी की तेज धार का प्रयोग करते हुए तो कोई नरमी नहीं ही बरती गई, ऐसे आरोप भी सामने आए कि पुलिस ने प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों पर पैलेट गन चलाई। जाहिर है, यह अपने आप में देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसमें नागरिक अधिकारों के लिहाज से एक बेहद चिंताजनक स्थिति थी कि विद्यार्थियों के भविष्य के मुद्दे पर हुए विरोध प्रदर्शन को देश के सामने खड़े हो गए किसी गंभीर संकट की तरह देखा गया।

पुलिस महकमे के रवैये का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जब पैलेट गन के छर्रे से पीड़ित युवक ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करानी चाही, तो उसकी भी अलग-अलग स्तर पर उपेक्षा की गई। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस की सक्रियता का क्या यह रूप होता है कि अगर कोई पीड़ित एफआइआर दर्ज कराना चाहे, तो उसे अपनी उपेक्षा की एक नई पीड़ा का सामना करना पड़े? क्या यही वह पहला बाधित दरवाजा नहीं है, जहां से न्याय हो पाने की उम्मीद धुंधली होनी शुरू होती है?

यह पुलिस महकमे के लिए असहज होने और शर्मिंदगी की बात होनी चाहिए कि पैलेट गन से पीड़ित युवक की प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए देश में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को पहल करनी पड़ी। हालांकि इसके बावजूद प्राथमिकी दर्ज करने में जिस तरह की टालमटोल की गई, उससे यही लगता है कि पुलिस की कार्यशैली में काफी सुधार की जरूरत है।

गौरतलब है कि पैलेट गन के छर्रे से पीड़ित युवक के साथ इस मामले की प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए जब राहुल गांधी खुद गए, तो एक तरह से उनकी भी उपेक्षा की गई और इसी के विरोध में उन्हें वहां धरने पर बैठना पड़ा। राहुल गांधी के सात घंटे तक धरने के बाद आखिरकार पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की। यह तब है, जब अस्पतालों की रिपोर्ट में युवक के पैलेट गन से घायल होने को लेकर सब कुछ स्पष्ट था।

सवाल है कि घटना और उसके संबंध में साक्ष्य के स्पष्ट होने के बावजूद पुलिस ने आखिर इतना टालमटोल किस वजह से किया! क्या इसके पीछे कोई परोक्ष दबाव काम कर रहा था?
यह सही है कि कुछ घटनाओं में एफआइआर दर्ज करने को लेकर पुलिस को कानूनी तकाजों के लिहाज से कई स्तर पर एहतियात बरतनी पड़ती है।

मगर क्या इस क्रम में न्याय की राह बाधित होने को उचित कहा जा सकता है? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़े थानों में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर ही तैयार होते हैं। इससे यह भी समझा जा सकता है कि एनसीआरबी के आंकड़ों में कितने वैसे मामले शामिल नहीं हो पाते होंगे, जिनकी एफआइआर नहीं लिखी जा पाती।

इस समूचे मामले में एक अहम पहलू यह है कि जब राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत दखल रखने वाले एक नेता की पहल पर भी किसी मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने में इतनी मुश्किल पेश आती है, तो आम नागरिकों को इसके लिए किस जद्दोजहद से गुजरना पड़ता होगा!

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