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संपादकीय: महंगाई का दुश्चक्र

जब मुद्रास्फीति छह फीसद से ऊपर निकलने लगती है तो केंद्रीय बैंक पर नीतिगत दरें बढ़ाने का दबाव बढ़ जाता है।

Author Published on: January 15, 2020 1:42 AM
आंकड़े बता रहे हैं कि महीने भर में ही दालों से लेकर सब्जियों तक के दाम आसमान छू गए।

खुदरा महंगाई जिस तेजी से बढ़ती जा रही है, उसमें आम आदमी का जीनामुहाल हो गया है। कुछ ही समय पहले रसोई गैस सिलेंडर और दूध के दाम बढ़े थे। प्याज के दाम तो कई महीनों से ऊंचे बने हुए हैं। ऐसे में आमजन कैसे गुजारा चला रहा है, यह अब छिपा नहीं रह गया है। सोमवार को सांख्यिकी एवं कार्यान्वयन मंत्रालय ने खुदरा महंगाई के जो आंकड़े जारी किए, वे चौंकाने वाले इसलिए भी हैं कि पिछले साढ़े पांच साल में खुदरा महंगाई सबसे ऊंचे स्तर पर चली गई है। सरकार के इस मंत्रालय ने बताया है कि दिसंबर में खुदरा महंगाई साढ़े सात फीसद रही, जबकि इससे पिछले महीने यह 5.54 फीसद रही थी।

पिछले साल दिसंबर में खुदरा महंगाई का आंकड़ा 2.18 फीसद था। इससे एक बात साफ है कि महंगाई होने की बात को सरकार समय-समय पर जिस तरह से खारिज करती रही है, ये आंकड़े उसके दावों की पोल खोलते हैं। मंगलवार को थोक महंगाई के आंकडेÞ भी आए, जो हालात की गंभीरता को पुष्ट करते हैं। महंगाई थोक हो या खुदरा, हकीकत ये है कि लोगों की जेब से तेजी से पैसे निकल रहे हैं और सरकार व रिजर्व बैंक हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

आखिर ऐसा क्या हुआ कि खुदरा महंगाई का ग्राफ तेजी से बढ़ गया? आंकड़े बता रहे हैं कि महीने भर में ही दालों से लेकर सब्जियों तक के दाम आसमान छू गए। सब्जियों के दाम तो पचहत्तर फीसद से भी ज्यादा तक बढ़ गए। अंडे, मांस-मछली, पेय पदार्थ और खान-पान से जुड़ी दूसरी चीजों में भी खासी बढ़ोतरी ने लोगों के पसीने छुड़ाए। अगर दाम बढ़ने का रुख ऐसा ही बना रहा तो सरकार का महंगाई प्रबंधन का कौशल कब काम आएगा? बड़ा सवाल यह है कि क्यों नहीं रिजर्व बैंक खुदरा महंगाई बढ़ने का अनुमान लगा पाया? यों हमेशा मुद्रास्फीति बढ़ने का बड़ा कारण पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ना बताया जाता है और ऐसा होता भी है, लेकिन इस बार तो पेट्रोल और डीजल के दाम भी इतने ज्यादा नहीं बढ़े हैं कि अचानक एक महीने में खान-पान की चीजें इतनी महंगी हो जाएं। ऐसे में खुदरा महंगाई बढ़ना और उसे रोक पाने में सरकार की नाकामी हैरान करने वाली है।

रिजर्व बैंक का खुदरा महंगाई का लक्ष्य दो से छह फीसद के बीच निर्धारित होता है। लेकिन अब खुदरा महंगाई इस छह फीसद से भी कहीं ऊपर निकल गई है। यह संकट आम लोगों के साथ रिजर्व बैंक के लिए भी कम नहीं है। खुदरा महंगाई बढ़ने से सबसे बड़ी मुश्किल ये खड़ी हो गई है कि नीतिगत दरों में और कटौती के रास्ते बंद हो गए हैं। जब मुद्रास्फीति छह फीसद से ऊपर निकलने लगती है तो केंद्रीय बैंक पर नीतिगत दरें बढ़ाने का दबाव बढ़ जाता है। इसका असर यह होता है कि बैंक कर्ज सस्ता होने के आसार कम हो जाते हैं। ऐसे में अभी अर्थव्यवस्था के रफ्तार देने के लिए कर्ज और सस्ता करने की दिशा में जिस तरह की कवायदें चल रही हैं, उनको धक्का लगेगा। महंगाई की मार आम आदमी को इसलिए भी ज्यादा सता रही है कि रोजगार के मोर्चे पर देश की हालत बदतर हो चुकी है। लोगों को नौकरियां नहीं मिल रहीं। मंदी के कारण लाखों लोगों का रोजगार जा चुका है। आबादी के बड़े हिस्से की आमद इतनी कम है कि वह महंगाई की मार झेल पाने में सक्षम नहीं है। महंगाई से निपटने के लिए रिजर्व बैंक के पास विकल्प बचे नहीं हैं। ऐसे में देखना यह होगा कि इस मसले से निपटने के लिए सरकार क्या कदम उठाती है, खासतौर से बजट में।

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