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संपादकीय: बेलगाम बदजुबानी

जब मामले ने तूल पकड़ लिया तब रघुराज सिंह ने इसकी बेमानी व्याख्या करके सफाई पेश करने की कोशिश की।

Author Published on: January 15, 2020 2:08 AM
राजनीति में मुद्दों पर विरोध जाहिर करने वालों के खिलाफ इस तरह के बयान का यह कोई अकेला मामला नहीं है। (फोटो-इंडियन एक्सप्रेस)

किसी मसले पर या फिर बिना किसी संदर्भ के भी नेताओं की बदजुबानी कोई नई बात नहीं है। फिर इन बयानों और इनसे उपजे विवाद के बाद आमतौर पर नेता सफाई देते नजर आते हैं। इसके बावजूद इस प्रवृत्ति पर किसी तरह की लगाम देखने को नहीं मिल रही है। पिछले दो दिनों के दौरान भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं ने सरेआम जिस तरह के बयान दिए हैं, उससे साफ है कि उन्हें देश में लोकतंत्र की कोई फिक्र नहीं है, बल्कि वे उसे नुकसान पहुंचाने से भी नहीं हिचक रहे हैं। सवाल है कि उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रघुराज सिंह ने राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में नारे लगाने वालों को जिस तरह ‘जिंदा दफन’ कर देने की धमकी दी, वह किस तरह की राजनीति का उदाहरण है? महज किसी मसले पर जनता के बीच पैदा हुई असहमति की वजह से अगर किसी पार्टी का कोई नेता इस तरह की धमकी देता है तो क्या इसे किसी लोकतंत्र विरोधी हरकत की तरह नहीं देखा जाना चाहिए? यह अलग बात है कि जब मामले ने तूल पकड़ लिया तब रघुराज सिंह ने इसकी बेमानी व्याख्या करके सफाई पेश करने की कोशिश की। लेकिन आखिर इस तरह की धमकी का स्रोत क्या हो सकता है?

राजनीति में मुद्दों पर विरोध जाहिर करने वालों के खिलाफ इस तरह के बयान का यह कोई अकेला मामला नहीं है। रविवार को पश्चिम बंगाल में भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष ने भी एक बेहद चिंताजनक और आपत्तिजनक बयान दिया। दिलीप घोष के मुताबिक हाल ही में पारित नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन करने वालों को भाजपा शासित राज्यों में कुत्तों की तरह गोलियों से मारा गया! सवाल है कि क्या उनका बयान विरोध प्रदर्शन करने वालों के प्रति भाजपा शासित राज्यों की सरकारों पर लगे आरोपों स्वीकारोक्ति है या फिर वे किसी मसले पर विरोध जताने वालों को लेकर अपनी पार्टी और उसकी सरकार के रुख को दर्शा रहे हैं?

बेलगाम बदजुबानी के ये दोनों ही ताजा प्रसंग यह बताने के लिए काफी हैं कि ऐसे लोग देश के लोकतंत्र को कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं। एक ओर प्रधानमंत्री खुद कहते हैं कि आलोचना और असहमति के अभाव में लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं, दूसरी ओर भाजपा के नेता गाहे-बगाहे ऐसे बयान देते रहते हैं जो लोकतंत्र को कमजोर करने वाले होते हैं। सवाल है कि क्या वे ऐसा करके प्रधानमंत्री के विचारों को ही धता नहीं बताते हैं?

एक समृद्ध लोकतांत्रिक परंपराओं वाला यह वही देश है, जहां सत्ता में बैठे शीर्ष नेताओं के खिलाफ विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अनेक मौके पर सख्त और तल्ख लहजे में अपना विरोध दर्ज कराया, जनता ने अपने वोट की ताकत से उन्हें सत्ता से बाहर भी किया, लेकिन इस तरह की अराजकता को कभी वैधता नहीं मिली। कई नेताओं ने अपनी आलोचना में दिए गए वक्तव्यों और बनाए गए व्यंग्य कार्टूनों पर भी परिपक्व रवैया अपनाया और इस तरह देश की राजनीति में लोकतांत्रिक परंपराएं मजबूत हुर्इं।

लेकिन अब अगर अपने से असहमति रखने वालों को ‘जिंदा दफन’ कर देने या फिर ‘कुत्तों की तरह गोली मारने’ जैसी धमकियां दी जाती हैं तो इसके निहितार्थ क्या हो सकते हैं? एक लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत चलने वाले देश में अपनी राय के पक्ष में इस तरह का उन्माद फैलाना यहां की राजनीति को किस दिशा में लेकर जाएगा? देश में लोकतंत्र की वजह से ही सत्ता की कुर्सी तक पहुंचे ऐसे नेता क्या अब ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की प्रवृत्ति को सही ठहराने में लगे हैं?

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