ताज़ा खबर
 

संपादकीय: कर्ज माफी का बोझ

दो साल पहले नीति आयोग और रिजर्व बैंक तक ने भी किसानों के कर्ज माफ करने को लेकर अपनी असहमति जताई थी।

Author Updated: January 14, 2020 1:08 AM
किसानों की कर्ज माफी को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं।

किसानों की कर्ज माफी अर्थव्यवस्था पर किस कदर भारी पड़ती जा रही है, इसका पता इस तथ्य से चलता है कि पिछले एक दशक में किसानों के करीब पौने पांच लाख करोड़ के कर्ज माफ कर दिए गए। इसमें दो लाख करोड़ रुपए तो पिछले दो साल में माफ किए गए। क्या यह गंभीर चिंता का विषय नहीं होना चाहिए कि एक तरफ तो हम किसानों के कर्ज माफ करते जा रहे हैं, लेकिन किसान की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है। ऐसे तो कर्ज देने और माफ करने का चक्र कभी टूटने वाला नहीं। किसानों की कर्ज माफी को लेकर एसबीआइ रिसर्च की ताजा चौंकाने वाली है। इसमें साफ कहा गया है कि पिछले एक दशक में जितनी रकम किसानों को कर्ज के रूप में बांट दी गई है, वह देश के उद्योग जगत के फंसे हुए कर्ज यानी एनपीए का बयासी फीसद है। जाहिर है, अगर कुछ समय और किसानों को कर्ज माफी का यह झुनझुना थमाया जाता रहा है तो देश के समक्ष एनपीए का एक और पहाड़ खड़ा हो जाएगा।

किसानों की कर्ज माफी को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना रहा है कि किसानों की दशा सुधारने के लिए कर्ज माफी कोई स्थायी समाधान नहीं है। इससे न तो किसानों की समस्याएं ही दूर हो पाती हैं, बल्कि सरकारी खजाने पर बोझ और बढ़ता चला जाता है। भारत में यह हमेशा की समस्या रही है कि कर्ज माफी को हमारे राजनीतिक दल और सरकारें किसानों के वोट हासिल करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करते आए हैं। लेकिन किसान की बुनियादी समस्याओं के समाधान की दिशा में कोई कारगर प्रयास शायद ही हुआ हो। इसलिए भारत का किसान खासतौर से छोटे सीमांत किसान आज भी उसी हालत में हैं जो दशकों से चली आ रही है।

पिछले दो साल में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में किसानों के कर्ज माफ होते रहे। अगर देश के कृषि क्षेत्र के लिए उचित नीतियां बनतीं और लागू होतीं तो आज भारत के करोड़ों किसान दयनीय हालत में नहीं होते और आत्महत्या करने को मजबूर नहीं होते। कृषि कर्जमाफी के आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले वित्त वर्ष यानी 2018-19 में कृषि कर्ज का एनपीए एक लाख करोड़ रुपए से निकल गया था, जो इस वक्त देश के सभी वित्तीय संस्थानों के कुल एनपीए 8.79 लाख करोड़ का साढ़े बारह फीसद बैठता है। नतीजे में सिर्फ यही कहा जा सकता है कि किसानों के लिए पैसा तो बहाया जा रहा है, पर वह बेकार जा रहा है।

दो साल पहले नीति आयोग और रिजर्व बैंक तक ने भी किसानों के कर्ज माफ करने को लेकर अपनी असहमति जताई थी। नीति आयोग ने तब साफ कहा था कि कर्ज माफी का फायदा एक सीमित वर्ग जो दस-पंद्रह फीसद से ज्यादा नहीं है, को ही पहुंचता है, इसलिए इसे किसानों की समस्या के हल में रूप में देखना व्यावहारिक नहीं है। रिजर्व बैंक भी किसानों के कर्ज माफ करने के पक्ष में इसलिए नहीं रहा है, क्योंकि बड़े पैमाने पर कृषि कर्ज माफी से सरकारी खजाने पर बोझ तो पड़ता ही है, महंगाई भी बढ़ती है। किसानों की मदद लिए बेहतर रास्ता यह हो सकता है कि उन्हें कर्ज माफी जैसी सुविधा के बजाय खेती की जरूरत का सामान मुहैया कराया जाए। ऐसी दूरगामी योजनाएं बनें जिनसे किसान आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सके और उसे कर्ज की जरूरत ही न पड़े।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 संपादकीय: आतंक का दायरा
2 संपादकीयः सजा और संदेश
3 संपादकीय: न्याय की उम्मीद
ये पढ़ा क्या?
X