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संपादकीय: बेवजह विवाद

1998 में नेपाल माओवादी मार्क्सवादी लेनिनवादी के समर्थकों ने इस क्षेत्र पर अवैध कब्जा करने की कोशिश की थी।

Author Published on: November 20, 2019 2:50 AM
नेपाल की इस तरह की धमकी दोनों देशों के बीच रिश्तों में आ रहे बदलाव का बड़ा संकेत है।

कालापानी क्षेत्र पर विवाद खड़ा करते हुए भारत के सदियों पुराने पड़ोसी नेपाल ने जिस तरह से आंखें तरेरी हैं, उसकी शायद ही किसी ने कल्पना की होगी। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने तल्ख तेवर में भारत को धमकाते हुए कह दिया कि नेपाल उसे अपनी एक भी इंच जमीन पर कब्जा नहीं करने देगा। कालापानी क्षेत्र को लेकर जो विवाद उठा है, उस बारे में दोनों देशों में लोग शायद जानते भी नहीं होंगे। हालांकि ऐसे छोटे-मोटे कुछ किलोमीटर के इलाके देशों की सीमाओं के आसपास होते हैं जो भौगोलिक और सामरिक दृष्टि से किसी भी देश के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं और इनकी वास्तविक स्थिति को लेकर विवाद की स्थिति बनी रहती है और वक्त पड़ने पर इनका राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कालापानी का विवाद उठा कर नेपाल यही कर रहा है। तथ्य यह है कि कालापानी भारत का क्षेत्र है, वहां अरसे से भारतीय सुरक्षा बल तैनात हैं। हाल में नेपाल इसलिए भड़का है कि भारत ने इकतीस अक्तूबर को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को नया केंद्र शासित प्रदेश बनाने के साथ ही देश का नया नक्शा जारी किया, जिसमें कालापानी को भारतीय क्षेत्र में दिखाया गया है।

नेपाल की इस तरह की धमकी दोनों देशों के बीच रिश्तों में आ रहे बदलाव का बड़ा संकेत है। ओली ने जिस अंदाज में और जिन शब्दों का इस्तेमाल करते हुए भारत को चेताया है, उससे उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि भारत ने कालापानी क्षेत्र पर कब्जा कर रखा है। जबकि तथ्य बताते हैं कि पैंतीस वर्ग किलोमीटर का यह त्रिकोणीय इलाका उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में आता है और इसकी सीमाएं चीन और नेपाल से सटी हैं। यह इलाका पिछले दो सौ साल से भी ज्यादा समय से भारत के अधिकार क्षेत्र में है। सन 1816 में गोरखाओं और अंग्रेजों के बीच हुई संधि में इसे भारत को सौंप दिया गया था। 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद से ही कालापानी में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और सशस्त्र सीमा बल की चौकियां हैं। नेपाल के किसी भी पूर्व शासक ने इसे कभी विवाद का मुद्दा नहीं बनाया। ऐसे में कालापानी कैसे नेपाल का हिस्सा हो गया, ओली के पास इसके कोई अकाट्य तर्क नहीं हैं।

कालापानी विवाद मूल रूप से नेपाल की वामपंथी सत्ता की उपज है, यह किसी से छिपा नहीं है। 1998 में नेपाल माओवादी मार्क्सवादी लेनिनवादी के समर्थकों ने इस क्षेत्र पर अवैध कब्जा करने की कोशिश की थी। कालापानी को लेकर नेपाल ने जिस तरह की आक्रामक कूटनीति दिखाई है, उससे यही लगता है कि इसके पीछे चीन का हाथ है। वरना नेपाल इस तरह से आंखें दिखाने की हिम्मत नहीं करता। यों भी सत्ता में आने के बाद से ही ओली भारत विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं। चीन के प्रति उनका प्रेम जगजाहिर है। चीन भले भारत से मधुर रिश्तों का दावा करता हो, लेकिन उसकी हर चाल भारत को घेरने की होती है। इससे पहले डोकलाम विवाद खड़ा करके चीन ने भूटान पर भारत से दूरी बनाने का दबाव बनाया था, लेकिन भूटान ने समझदारी दिखाई और सदियों पुराने रिश्तों को देखते हुए भारत के साथ खड़ा रहा। उस नाकामी के बाद चीन ने अब नेपाल पर डोरे डाले हैं और कालापानी को विवाद का मुद्दा बनाने की रणनीति बनाई है। भारत हमेशा से हर मामले में नेपाल का साथ देता आया है, यह नेपाल की सत्ता को नहीं भूलना चाहिए। दूसरों के इशारे पर इस तरह के विवाद सिर्फ अशांति को ही जन्म देंगे।

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