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संपादकीय: शिक्षा की खातिर

विद्यार्थियों की एक बड़ी आपत्ति यह भी है कि छात्रावास के समय और भोजन के हॉल में जाने के लिए जो शर्तें बताई गई हैं, वे उनके अध्ययन और परिसर में सहज जीवनशैली पर चोट है।

Author Published on: November 20, 2019 2:42 AM
जब पुलिस के रवैये की तीखी आलोचना सामने आई तो कहा गया कि उसकी ओर से हिंसा नहीं की गई।

राजधानी दिल्ली स्थित जेएनयू यानी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में नए नियम-कायदों की घोषणा के विरोध में विद्यार्थियों के बीच उभरे विरोध और प्रदर्शन से विश्वविद्यालय और फिर दिल्ली पुलिस ने जिस तरह निपटने की कोशिश की, उसे एक तरह से उपेक्षा और दमन का उदाहरण कहा जा सकता है। हैरानी की बात यह है कि जेएनयू में उठे जिन सवालों पर विचार करने की जरूरत थी, उसके लिए प्रशासन ने एक ऐसी जिद ठान ली, जिसका नतीजा विद्यार्थियों के विरोध प्रदर्शन के रूप में सामने आया। जैसी खबरें सामने आर्इं, उसके मुताबिक यह समझना मुश्किल है कि लोकतांत्रिक तरीके से किए जा रहे विरोध प्रदर्शन से निपटने के लिए पुलिस को इस हद तक सख्ती क्यों बरतनी पड़ी, बिना भेदभाव के छात्र-छात्राओं पर लाठीचार्ज करने और कइयों को हिरासत में लेने की जरूरत क्यों पड़ी! हालांकि जब पुलिस के रवैये की तीखी आलोचना सामने आई तो कहा गया कि उसकी ओर से हिंसा नहीं की गई। लेकिन लाठीचार्ज में घायल छात्र-छात्राओं की जैसी तस्वीरें और अन्य वीडियो सामने आए हैं, उससे साफ है कि पुलिस ने बिना किसी बड़ी वजह के विद्यार्थियों के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार किया।

इस समूचे प्रकरण में एक बड़ी समस्या यह देखी गई है कि जेएनयू में उभरे इस विरोध को परिसर से बाहर सिर्फ छात्रावास की दस रुपए महीने की फीस में बढ़ोतरी तक केंद्रित करके प्रचारित किया गया। कई लोगों को यह रकम बेहद मामूली लगी और विद्यार्थियों का विरोध अनुचित। जबकि सच यह है कि नई नियमावली में छात्रावास शुल्क के अलावा भी मेस सेक्युरिटी, बिजली-पानी जैसी कई मदों में काफी ज्यादा बढ़ोतरी की गई है और उसे वहां पढ़ाई और शोध कर रहे बहुत सारे विद्यार्थियों की पहुंच से बाहर होने के तौर पर देखा गया है।

विद्यार्थियों की एक बड़ी आपत्ति यह भी है कि छात्रावास के समय और भोजन के हॉल में जाने के लिए जो शर्तें बताई गई हैं, वे उनके अध्ययन और परिसर में सहज जीवनशैली पर चोट है। अब तक जेएनयू का पुस्तकालय चौबीसों घंटे खुला रहता आया है और वहां अध्ययन और शोध करने वाले विद्यार्थी अपनी सुविधा और जरूरत के मुताबिक जाकर पढ़ाई करते हैं। लेकिन अगर छात्रावास में रात साढ़े ग्यारह बजे तक हर हाल में लौट आने का नियम लागू हो जाए तो रात में पुस्तकालय की पढ़ाई बंद हो जाएगी। फिर डाइनिंग हॉल में जिस तरह ‘उचित कपड़े’ पहन कर आने की शर्त बताई गई है, वह एक तरह से ‘मोरल पुलिसिंग’ है और नैतिकता के अतिवाद को थोपने जैसा है।

दरअसल, पिछले कुछ समय से जेएनयू के बारे में जिस तरह की बातें चर्चा में आर्इं, उसमें कई महत्त्वपूर्ण सवाल गौण हो गए। कायदे से शिक्षा पर आने वाला खर्च सिर्फ इतना ही होना चाहिए कि वह समाज के सबसे कमजोर तबके तक की भी पहुंच में हो। जेएनयू सहित सरकार की ओर से संचालित शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई से लेकर छात्रावास और दूसरी सुविधाओं तक का खर्च इसी मकसद से इतना रखा गया है कि वहां किसी भी सामाजिक वर्ग से आने वाले विद्यार्थी की पढ़ाई में आर्थिक प्रश्न बाधा नहीं बने।

जहां तक आम जनता से वसूले गए टैक्स के दुरुपयोग का सवाल है तो इस संदर्भ से देश भर में सांसदों-विधायकों के वेतन-भत्तों से लेकर निजी कंपनियों के टैक्स या कर्ज में रियायत और माफी को लेकर कई मुद्दे उठते रहे हैं। बहरहाल, देश में लोकतंत्र की मजबूत बुनियाद को देखते हुए तकाजा यही है कि सरकार शिक्षा पर आने वाले खर्च को सबकी पहुंच में बनाए। साथ ही, किसी लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन से पेश आने का तौर-तरीका ऐसा होना चाहिए, ताकि लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हों।

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