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संपादकीय: महंगी शिक्षा

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ऐसे तमाम बच्चे होते हैं जिनके परिवारों की आर्थिक हैसियत संतोषजनक भी नहीं होती है।

Author नई दिल्ली | Published on: August 13, 2019 4:07 AM
सांकेतिक तस्वीर।

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की ओर से दसवीं और बारहवीं कक्षा के परीक्षा शुल्क में भारी बढ़ोतरी की घोषणा के बाद स्वाभाविक ही यह सवाल उठा है कि खासतौर पर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले कमजोर तबके के विद्यार्थियों के भविष्य पर इसका क्या असर पड़ेगा। सीबीएसई की ताजा घोषणा ने इसलिए भी लोगों को सोचने पर मजबूर किया है कि इसमें सामान्य तबके से आने वाले विद्यार्थियों के लिए निर्धारित फीस में जहां दुगनी राशि की बढ़ोतरी की गई है, वहीं अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के बच्चों को अब पुराने शुल्क के मुकाबले चौबीस गुनी ज्यादा रकम देनी होगी। यानी सामान्य वर्ग के बच्चों को पहले के साढ़े सात सौ के बजाय अब जहां पंद्रह सौ रुपए चुकाने होंगे, वहीं अनुसूचित जाति-जनजाति के बच्चों को पचास रुपए की जगह बारह सौ रुपए देने होंगे। यों सवाल उठने पर सीबीएसई ने यह सफाई पेश की है कि फीस में वृद्धि पांच साल बाद की गई है। लेकिन सवाल यह भी है कि पांच साल तक कोई वृद्धि नहीं करने के बाद अचानक इतनी बड़ी बढ़ोतरी की जरूरत क्यों पड़ गई! क्या ताजा वृद्धि के सहारे पिछले पांच सालों के घाटे को पूरा करने की कोशिश की जा रही है?

यह समझना मुश्किल है कि फीस में अचानक इतनी ज्यादा वृद्धि का क्या औचित्य है और क्या यह फैसला लेते हुए सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखा गया! गौरतलब है कि सीबीएसई के पाठ्यक्रमों के तहत एक ओर निजी स्कूल हैं तो दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की संख्या भी बड़ी है। इस संदर्भ में देखें तो हो सकता है कि शुल्क में ताजा बढ़ोतरी से निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों पर कोई बड़ा फर्क नहीं पड़े, लेकिन सरकारी स्कूलों में जिस आर्थिक और सामाजिक तबके के बच्चे आते हैं, उनके बारे में यही बात शायद दावे के साथ नहीं कही जा सकती।

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ऐसे तमाम बच्चे होते हैं जिनके परिवारों की आर्थिक हैसियत संतोषजनक भी नहीं होती है। खासतौर पर अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के बच्चों के माता-पिता कई बार न्यूनतम खर्च से अपना काम चलाते हैं और सरकारी स्कूल में कम खर्च के भरोसे ही अपने बच्चों को पढ़ने भेज पाते हैं। ऐसे में उनकी फीस में सीधे चौबीस गुनी बढ़ोतरी का असर इन तबकों के बच्चों के भविष्य की पढ़ाई पर पड़ सकता है।

सवाल है कि अगर इस वजह से किसी बच्चे की पढ़ाई बाधित होती है तो इसकी जिम्मेदारी किस पर आएगी और क्या यह शिक्षा का अधिकार कानून के खिलाफ नहीं होगा? यह बेवजह नहीं है कि सीबीएसई की फीस बढ़ोतरी की ताजा पहलकदमी पर अभिभावकों ने भारी असंतोष जताया है। अखिल भारतीय अभिभावक संघ ने इस फैसले को असंवैधानिक बताते हुए अदालत में चुनौती देने की बात कही है। दरअसल, अच्छी शिक्षा के नाम पर निजी स्कूलों में जो फीस वसूली जाती है और उसे चुकाने में जो लोग सक्षम नहीं होते हैं, आमतौर पर वही अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजते हैं।

लेकिन अगर यहां भी सरकारी जिम्मेदारियों में जनता के कल्याण की अवधारणा को अहम मानने के बजाय फीस की रकम को प्राथमिक माना जाएगा तो गरीब तबकों के बीच शिक्षा के प्रसार पर इसका क्या असर पड़ेगा? साक्षरता दर के मामले में अभी हमारे देश को बहुत कुछ करना बाकी है। इस मकसद से सरकार अनेक तरह की योजनाओं पर काम कर रही है। इसके मद्देनजर यह ध्यान रखने की जरूरत होगी कि किसी स्थिति में स्कूली बच्चों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ की वजह से शिक्षा का अधिकार कानून बाधित न हो।

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