ताज़ा खबर
 

परंपरा के बहाने

तमिलनाडु में जल्लीकट्टू यानी सांड़ों को काबू में करने के खेल को फिर से शुरू करने की इजाजत देने के केंद्र के फैसले पर पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने स्वाभाविक ही नाराजगी जताई है।

Author January 11, 2016 02:19 am
युवक पर हमला करता तमिलनाड़ू के साड़ की एक फाइल फोटो

तमिलनाडु में जल्लीकट्टू यानी सांड़ों को काबू में करने के खेल को फिर से शुरू करने की इजाजत देने के केंद्र के फैसले पर पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने स्वाभाविक ही नाराजगी जताई है। जल्लीकट्टू पर चार साल से चला आ रहा प्रतिबंध केंद्र ने क्यों हटा लिया? क्या पशुओं के प्रति क्रूरता का मामला उसके लिए तभी चिंताजनक होता है, जब वोट का गणित सधने की उम्मीद दिखती हो?

तमिलनाडु में जल्लीकट्टू पर पाबंदी हटाने का फैसला राज्य के प्रमुख पर्व पोंगल से ऐन पहले किया गया। पोंगल त्योहार के मौके पर राज्य में जल्लीकट्टू का आयोजन चार साल पहले तक बड़े पैमाने पर होता रहा। राज्य में सांड़ों को नियंत्रित करने का यह खेल पारंपरिक रूप से लोकप्रिय रहा है। इसीलिए केंद्र के इस फैसले पर मुख्यमंत्री जयललिता ने जहां प्रधानमंत्री का आभार जताया, वहीं द्रमुक ने भी खुशी जाहिर की है।

केंद्र के इस कदम को इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। तो क्या भाजपा ने भी जल्लीकट्टू संबंधी फैसले के जरिए तमिलनाडु में अपनी किस्मत संवरने की आस लगाई है? पर तमिलनाडु में उसका कोई खास संगठन या जनाधार नहीं है। इसलिए केंद्र के निर्णय का एक बड़ा कारण राज्यसभा का गणित भी हो सकता है, जहां सत्तापक्ष का बहुमत नहीं है, और कांग्रेस की काट के लिए भाजपा क्षेत्रीय दलों को साधने की जुगत में है। केंद्र ने महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, केरल और गुजरात में बैलगाड़ी दौड़ आयोजित करने की भी फिर से अनुमति दे दी है। अलबत्ता जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी-दौड़ की बाबत कुछ शर्तें लगाई गई हैं।

लेकिन क्या परंपरा के नाम पर ऐसी चीजों को चलने देना उचित है, जो क्रूरता की वाहक हैं? परंपरा में बहुत कुछ शामिल रहता है, वांछित भी और अवांछित भी। यह हमारे विवेक और नजरिए पर निर्भर करता है कि हम क्या चुनते हैं। जल्लीकट््टू जैसे खेल की विदाई वक्त का तकाजा है। पर केंद्र की मेहरबानी से इसकी वापसी हो गई है। मजे की बात है कि मोदी सरकार का यह फैसला बहुत-से भाजपा समर्थकों के भी गले नहीं उतरा है। खुद केंद्र के महाधिवक्ता की राय थी कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को देखते हुए जल्लीकट््टू के आयोजन की इजाजत देने की अधिसूचना जारी करना ठीक नहीं होगा। वर्ष 2011 में यूपीए सरकार के समय जल्लीकट््टू पर प्रतिबंध लगा था। तब से

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App