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संपादकीयः संकट और सवाल

बैंकों से जुड़े हर मामले की जांच और उन पर निगरानी की जिम्मेदारी बैंकिंग नियामक यानी भारतीय रिजर्व की है। हर बैंक का समय-समय पर ऑडिट होता है। इसके अलावा भारतीय रिजर्व का अपना ऑडिट विभाग है जो बैंकों का ऑडिट करता है।

Author Published on: March 9, 2020 1:02 AM
येस बैंक का 2014 में कर्ज का आंकड़ा पचपन हजार करोड़ रुपए था।

येस बैंक डूबने की घटना ने भारत की बैंकिंग प्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। जिस तरह से यह बैंक ध्वस्त हुआ, उससे साफ है कि इस पर कोई निगरानी नहीं थी। अगर हो रही थी, तो वह दिखावे से ज्यादा की कार्रवाई नहीं रही होगी। बैंक का शीर्ष प्रबंधन ऐसे फैसला करता गया, जिनका नतीजा आज सबके सामने है। बैंकों से जुड़े हर मामले की जांच और उन पर निगरानी की जिम्मेदारी बैंकिंग नियामक यानी भारतीय रिजर्व की है। हर बैंक का समय-समय पर ऑडिट होता है। इसके अलावा भारतीय रिजर्व का अपना ऑडिट विभाग है जो बैंकों का ऑडिट करता है। फिर भी येस बैंक पिछले दो साल में बर्बादी की कगार पर चला गया! इसलिए अब सवाल उठ रहा है कि जो कदम आज उठाए जा रहे हैं, वे पहले ही क्यों नहीं उठा लिए गए? येस बैंक के बारे में जो जानकारियां अब बाहर आ रही हैं, वे चौंकाने वाली हैं। बैंक के संस्थापक राणा कपूर जिस तरह अपने परिचितों को कर्ज लुटाते रहे, उसका खामियाजा आज बैंक खाताधारकों को उठाना पड़ रहा है।

पंजाब नेशनल बैंक में जब साढ़े तेरह हजार करोड़ रुपए के घोटाले का पर्दाफाश हुआ था, उस वक्त भी बैंकिंग नियामक की भूमिका को लेकर सवाल उठे थे। बाद में यह सामने आया कि जिस शाखा से नीरव मोदी का लेनदेन चलता था, उसका लंबे समय तक ऑडिट ही नहीं हुआ था। अगर समय-समय पर जांच होती रहती, तो नीरव मोदी बैंक को ऐसी भारी चपत नहीं लगा पाता। लेकिन इन दो सालों में भी बैंकों के निगरानी तंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में कोई काम नहीं हुआ। हालांकि येस बैंक को लेकर गड़बड़ियों की भनक रिजर्व बैंक को पहले से थी। पहली बार 2017 में केंद्रीय बैंक ने डूबते कर्ज को लेकर येस बैंक को चेताया था और जांच के बाद बैंक के तत्कालीन प्रमुख राणा कपूर को सेवा विस्तार देने से इनकार कर दिया था। उस वक्त बैंक को बचाने के लिए अगर कुछ सख्त कदम और उठा लिए होते तो आज येस बैंक की शाखाओं और एटीएम के बाहर भीड़ को धक्के खाने को मजबूर नहीं होना पड़ता।

डूबता कर्ज सरकार, बैंकों और रिजर्व बैंक तीनों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। येस बैंक का 2014 में कर्ज का आंकड़ा पचपन हजार करोड़ रुपए था जो अगले साल यानी 2015 में पचहत्तर हजार करोड़, 2016 में अनठानवे हजार करोड़ , 2017 में एक लाख बत्तीस हजार करोड़, 2018 में दो लाख तीन हजार करोड़ और 2019 दो लाख इकतालीस हजार करोड़ तक जा पहुंचा। सवाल है कैसे बैंक इतना कर्ज देता गया? अब पता चल रहा है कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (डीएचएफएल) को जो कर्ज दिया गया, उसका हिस्सा बतौर कर्ज के रूप में यह कंपनी राणा कपूर की बेटियों को देती रही। अभी इस घोटाले की परतें खुलनी बाकी हैं। येस बैंक ने आइएलएंडएफएस, अनिल अंबानी समूह, सीजी पॉवर, कॉक्स एंड किंग, कैफे कॉफी डे जैसी कंपनियों को कर्ज दे रखा है, जिनसे वसूली आसान नहीं है। बैंकिंग क्षेत्र को बचाने के लिए आज सबसे बड़ी जरूरत बैंकिंग नियामक को मजबूत, जिम्मेदार और जवाबदेह बनाने की है। कर्ज देने के नियमों की पालना सख्ती से हो, किसी के दबाव में आकर कर्ज न बांटे जाएं और बैंकों का नियमित ऑडिट सुनिश्चित हो। यह नहीं भूलना चाहिए कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों के घोटालों में डूबा पैसा जनता का ही है।

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