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संपादकीय: कामयाबी की उड़ान

भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव छठे दशक की शुरुआत में पड़ी थी जब 1963 में पहली बार थुंबा से रॉकेट छोड़ा गया था और उस रॉकेट को प्रक्षेपण स्थल तक हमारे वैज्ञानिक साइकिल पर लाद कर ले गए थे। तब कोई सुविधाएं नहीं थीं।

भारत ने सोमवार को चंद्रयान-2 के सफल प्रक्षेपण को अंजाम देकर अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक और बड़ी छलांग लगा दी।

भारत ने सोमवार को चंद्रयान-2 के सफल प्रक्षेपण को अंजाम देकर अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक और बड़ी छलांग लगा दी। यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और देश के दूसरे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थानों के वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम का ही परिणाम है कि चंद्रयान-2 मिशन की सफलता ने भारत को दुनिया के उन देशों की कतार में खड़ा कर दिया है जिनके यान चंद्रमा की सतह पर उतरे हैं। सितंबर के पहले हफ्ते में चंद्रयान-2 का लैंडर चांद की सतह पर उतरने के साथ अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत ऐसी उपलब्धि हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा। पिछले हफ्ते अचानक आई तकनीकी गड़बड़ी की वजह से जब चंद्रयान-2 अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार रवाना नहीं हो पाया था तो इस घटना को भारत के लिए एक बड़ा झटका माना गया था। लेकिन यह ऐसी कोई गड़बड़ी नहीं थी जिसे भारत के चंद्रयान-2 मिशन की असफलता के रूप में देखा जाता। चंद्रयान को ले जाने वाले रॉकेट ‘बाहुबली’ में ईंधन भरते समय रिसाव का पता चल गया था, जिस वजह से इसका प्रक्षेपण टालना पड़ा था। अब चंद्रयान-2 पृथ्वी की कक्षा में चक्कर काट रहा है और सत्रह दिन बाद यह चंद्रमा की कक्षा के पथ पर बढ़ेगा।

अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों ने हमेशा से अपनी प्रतिभा और क्षमताओं का लोहा मनवाया है। चंद्रमा शुरू से ही वैज्ञानिकों के लिए गहरी दिलचस्पी और शोध का विषय रहा है। माना जाता है कि धरती की उत्पत्ति से जुड़े रहस्य चांद में छिपे हैं। दुनिया में अब तक जितने भी अंतरिक्ष मिशन दूसरे ग्रहों की ओर भेजे गए हैं, उनका मकसद ब्रह्मांड के बारे में आंकड़े और तस्वीरें जुटाना रहा है, ताकि सृष्टि के रहस्यों पर से परदा उठ सके। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने पिछले तीन-चार दशकों में जिस तेजी से तरक्की है, चंद्रयान और मंगल मिशन जैसे सफल अभियान उसी का परिणाम हैं। चंद्रयान मिशन भारत का पुराना मिशन रहा है और 2008 में भारत ने जो चंद्रयान-1 चांद की कक्षा में भेजा था, उसी से पहली बार धरती के इस उपग्रह पर पानी की मौजूदगी के संकेत मिले थे।

भारत का चंद्रयान-2 मिशन सबसे महत्त्वपूर्ण और जटिल इसलिए भी है कि इस यान को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर एटकेन बेसिन नामक जिस स्थान पर उतरना है वहां आज तक कोई अंतरिक्ष यान नहीं पहुंचा है। मौसम के लिहाज से भी यह स्थान काफी चुनौती भरा है। इसके अलावा चंद्रमा पर धूल के गुबार भी बड़ी समस्या हैं। ऐसे में चंद्रयान-2 के लैंडर और रोवर में जो उपकरण लगे हैं, वे सही से काम करते रहें, वैज्ञानिकों के लिए यह बड़ी चुनौती है। चंद्रयान-2 मिशन की सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि इसके निर्माण में ज्यादातर योगदान भारतीय संस्थानों और कंपनियों का ही रहा है। इसके लिए भारत को दूसरे देशों का मुंह नहीं ताकना पड़ा। रोवर आइआइटी-कानपुर में विकसित किया गया है जिसे पानी और खनिजों के बारे में जानकारी जुटानी है। भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव छठे दशक की शुरुआत में पड़ी थी जब 1963 में पहली बार थुंबा से रॉकेट छोड़ा गया था और उस रॉकेट को प्रक्षेपण स्थल तक हमारे वैज्ञानिक साइकिल पर लाद कर ले गए थे। तब कोई सुविधाएं नहीं थीं। इसरो का गठन 1969 में हुआ। सच्चाई तो यह है कि हमारे वैज्ञानिकों और विज्ञान व प्रौद्योगिकी संस्थानों को पैसे की भारी कमी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अगर चंद्रयान-2 जैसे मिशन कामयाब हो रहे हैं तो इस श्रेय का हकदार सिर्फ हमारे देश का वैज्ञानिक समुदाय है।

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