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आग के मुहाने

दिल्ली के बवाना औद्योगिक क्षेत्र के तीन कारखानों में लगी आग से सत्रह लोगों के मारे जाने के बाद एक बार फिर राजनीतिक रस्साकशी शुरू हो गई है।

Author January 22, 2018 2:27 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

दिल्ली के बवाना औद्योगिक क्षेत्र के तीन कारखानों में लगी आग से सत्रह लोगों के मारे जाने के बाद एक बार फिर राजनीतिक रस्साकशी शुरू हो गई है। विचित्र है कि ऐसे मौकों पर पीड़ितों और उनके परिजनों के आंसू पोंछने को हाथ बढ़ाना चाहिए, दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का प्रयास होना चाहिए, राजनीतिक दलों को अपने जनाधार की फिक्र ज्यादा सताने लगती है। यह पहली बार नहीं है, जब दिल्ली के किसी औद्योगिक इलाके में भीषण आगजनी और कंपनी मालिकों के सुरक्षा इंतजामों की अनदेखी के चलते श्रमिकों को इस तरह अपनी जान गंवानी पड़ी है। प्राय: हर साल ऐसे हादसे हो जाते हैं। मगर हैरानी की बात है कि उनसे सबक नहीं लिया जाता। कुछ साल पहले ही वजीराबाद औद्योगिक इलाके में एक चप्पल बनाने वाले कारखाने में इसी तरह आग लगने से कई मजदूरों की मौत हो गई थी। छानबीन में खुलासा हुआ कि कारखाना मालिक न सिर्फ कई साल से सुरक्षा नियमों की अवहेलना करता आ रहा था, बल्कि मजदूरों को भीतर काम करता छोड़ बाहर से ताला लगा कर घर या दूसरे किसी काम पर निकल जाता था। ऐसा बहुत सारे कारखाना मालिक करते देखे जाते हैं।

बवाना इलाके के कारखानों में लगी आग में भी प्राथमिक तौर पर मिली जानकारियों के मुताबिक कारखाना मालिक नियम-कायदों की अनदेखी कर रहे थे। बताया जा रहा है कि उनमें से एक कारखाना मालिक ने लाइसेंस प्लास्टिक की वस्तुएं बनाने के लिए ले रखा था, पर उसमें अवैध रूप से विस्फोटकों का निर्माण और भंडारण किया जा रहा था। आग पटाखों वाले तल पर ही लगी और उसने देखते-देखते भीषण रूप ले लिया। आग इतनी भयावह थी कि वहां काम कर रहे लोगों के लिए भाग निकलने का मौका भी नहीं मिल पाया। कारखाने में न तो आग आदि जैसी आपात स्थिति से बचाव के उपाय थे, और न निकास का समुचित प्रबंध था। उस आग ने दूसरे कारखानों को भी अपनी चपेट में ले लिया। समझना मुश्किल नहीं है कि नियम-कायदों की अनदेखी और अवैध रूप से कारोबार करने का साहस कारखाना मालिक को कहां से मिला होगा। दरअसल, औद्योगिक इलाकों में सुरक्षा इंतजामों और उत्पादन आदि पर नजर रखने की जिम्मेदारी जिन महकमों पर होती है, वे खुद मुस्तैदी से अपना कर्तव्य निर्वाह नहीं करते। फिर रसूखदार लोगों के प्रभाव और दूसरे प्रलोभनों में आकर कारखाना मालिकों की मनमानियों की तरफ से आंखें मूंद लेते हैं, जिसका खमियाजा वहां दो जून की रोटी के लिए खट रहे श्रमिकों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ता है।

कारखानों की मनमानियों पर अंकुश न लगाए जा सकने का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बवाना की ताजा घटना पर दिल्ली नगर निगम और दिल्ली सरकार आपस में इस बात को लेकर गुत्थमगुत्था हो गर्इं कि कारखानों को लाइसेंस देने की जिम्मेदारी किसकी है। अगर कारखाने की इमारतों के नक्शे पास करते समय ही सुरक्षा उपायों पर निगरानी रखी जाती, उनका लाइसेंस नवीकृत करने से पहले उनमें चल रही गतिविधियों पर ध्यान दिया जाता और उनके संचालन पर मुस्तैदी से और निरंतर नजर रखी जाती, तो शायद ऐसे हादसों से बचा जा सकता था। मगर ऐसे हादसों के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष आपस में दोषारोपण करके, पीड़ितों को मुआवजे और जांच की घोषणा आदि के बाद अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेते हैं। जब तक कारखानों पर नजर रखने वाले महकमों की जवाबदेही तय नहीं होती, ऐसे हादसों का सिलसिला शायद ही रुके।

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