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संपादकीय : महंगाई की फिक्र

नीतिगत ब्याज दरों की बाबत यथास्थिति कायम रखने के ढेर सारे अनुमानों को धता बताते हुए रिजर्व बैंक ने रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में चौथाई फीसद की वृद्धि करना ही मुनासिब समझा। लेकिन इससे बाजार में मांग ज्यादा प्रभावित न हो, इसका खयाल रखते हुए कुछ तजवीज भी की गई है।

Author June 8, 2018 4:57 AM
भारतीय रिजर्व बैंक। (एक्सप्रेस फोटोः प्रदीप दास)

लगभग हर बार मौद्रिक समीक्षा से पहले रिजर्व बैंक को एक दुविधा से गुजरना पड़ता है, कि वह बाजार में तेजी और अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को प्रोत्साहित करने वाले उपायों को तरजीह दे या महंगाई नियंत्रण को। इस बार की मौद्रिक समीक्षा से जाहिर है कि रिजर्व बैंक ने महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता दी है। उसने पिछले चार साल में पहली बार रेपो दरों में चौथाई फीसद की बढ़ोतरी की है। रेपो रेट 6 फीसद से बढ़ कर अब 6.25 फीसद और रिवर्स रेपो रेट 5.75 फीसद से बढ़ कर 6 फीसद हो गई है। पिछले चार साल में छह बार रेपो रेट घटाई गई थी; जनवरी 2014 के बाद यह पहला मौका है जब रेपो रेट बढ़ाई गई है। आखिर रिजर्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा नीति ने तीन दिन की माथापच्ची के बाद चार साल से चले आ रहे सिलसिले को क्यों पलट दिया। दरअसल, कई कारणों से महंगाई और बढ़ने का अंदेशा दिख रहा था। यह चिंता सरकार को भी रही होगी। खुदरा महंगाई दर मार्च और अप्रैल में चार से पांच फीसद के बीच थी। हालांकि रिजर्व बैंक ने चालू वित्तवर्ष में मुद्रास्फीति के अपने लक्ष्य में कोई फेरबदल नहीं किया है, लेकिन उसका अनुमान है कि पहली छमाही में यह पांच फीसद के आसपास रहेगी।

महंगाई को लेकर रिजर्व बैंक के चिंता में पड़ जाने की वजहें साफ हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें चढ़ी हैं और इस रुझान पर रोक लगने के फिलहाल कोई संकेत नहीं हैं। इसके फलस्वरूप देश में पेट्रोल-डीजल के खुदरा दाम तो बढ़े ही हैं, परिवहन और ढुलाई का खर्च बढ़ जाने से तमाम चीजों की मूल्यवृद्धि का खतरा दिख रहा है। मौद्रिक समीक्षा समिति इस खतरे को नजरअंदाज नहीं कर सकती थी। समिति के ताजा फैसले के फलस्वरूप कर्ज महंगा होने की आशंका है यानी वाहन, मकान आदि के लिए कर्ज लेने वालों को पहले के मुकाबले ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ेगा; पहले से लिये हुए कर्जों के भुगतान की किस्तें भी थोड़ी बढ़ सकती हैं। इससे बाजार में मांग पर प्रतिकूल असर पड़ने और वृद्धि दर को थोड़ा झटका लगने का अंदेशा जताया जा रहा है। पर पिछले वित्तवर्ष की आखिरी तिमाही में 7.7 फीसद की वृद्धि दर से रिजर्व बैंक को लगा होगा कि वृद्धि दर को लेकर थोड़ा जोखिम उठाया जा सकता है, पर महंगाई के मामले में जोखिम लेना महंगा साबित हो सकता है। इसी तरह, डॉलर के मुकाबले रुपए के रिकार्ड अवमूल्यन ने भी रिजर्व बैंक को चिंतित किया होगा, और वैश्विक वित्तीय बाजार की अनिश्चितताओं ने भी।

इसलिए नीतिगत ब्याज दरों की बाबत यथास्थिति कायम रखने के ढेर सारे अनुमानों को धता बताते हुए रिजर्व बैंक ने रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में चौथाई फीसद की वृद्धि करना ही मुनासिब समझा। लेकिन इससे बाजार में मांग ज्यादा प्रभावित न हो, इसका खयाल रखते हुए कुछ तजवीज भी की गई है। मसलन, रिजर्व बैंक ने दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में सस्ते मकानों के लिए कर्ज सीमा पैंतीस लाख रुपए कर दी है, पहले यह सीमा अट्ठाईस लाख रुपए थी। इसी तरह, दस लाख से कम आबादी वाले शहरों के लिए यह सीमा बीस लाख रुपए से बढ़ा कर पच्चीस लाख रुपए कर दी है। उम्मीद की गई है कि इससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए सस्ते मकान ज्यादा बन सकेंगे। बहरहाल, चुनावी साल में महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता देने का रिजर्व बैंक का फैसला सरकार को रास आया होगा, पर इस स्थिति को सरकार को चेतावनी के रूप में भी लेना चाहिए।

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