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संपादकीय: तेलंगाना की राह

गुरुवार को तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने जिस तरह विधानसभा भंग करने की सिफारिश की और एक सौ पांच उम्मीदवारों की सूची भी जारी कर दी, उसने राजनीतिक प्रेक्षकों को चौंका दिया। लेकिन फिलहाल राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक सक्रियता का जो आलम है, उसमें यह चंद्रशेखर राव का सोचा-समझा हुआ गणित लगता है।

Author September 8, 2018 1:49 AM
तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव

पिछले कुछ समय से इस तरह अटकलें लगातार सामने आ रही थीं कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव राज्य में समय से पहले चुनाव कराने के लिए विधानसभा भंग कर सकते हैं। लेकिन इसकी कोई साफ तस्वीर सामने नहीं आ रही थी, इसलिए अंदाजा यह भी लगाया जा रहा था कि तेलंगाना में समय पर कार्यकाल खत्म होने के बाद लोकसभा के साथ ही चुनाव कराया जा सकता है। मगर राजनीति अनिश्चितताओं की बिसात है। गुरुवार को तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने जिस तरह विधानसभा भंग करने की सिफारिश की और एक सौ पांच उम्मीदवारों की सूची भी जारी कर दी, उसने राजनीतिक प्रेक्षकों को चौंका दिया। लेकिन फिलहाल राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक सक्रियता का जो आलम है, उसमें यह चंद्रशेखर राव का सोचा-समझा हुआ गणित लगता है। दरअसल, फिलहाल राज्य में शासन और जन-कल्याण योजनाओं में अपने बेहतर प्रदर्शन के आधार पर टीआरएस यानी तेलंगाना राष्ट्र समिति को यह लग रहा है कि अगर अभी चुनाव हुए तो सत्ता में आने के उसके रास्ते में कोई बाधा पैदा नहीं होगी। जबकि छह महीने के बाद तेजी से बदलने वाले राजनीतिक हालात में समीकरण उसके लिए चुनौती भी साबित हो सकते हैं।

गौरतलब है कि कुछ समय पहले लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान और फिर राज्यसभा में उपसभापति के चुनाव में टीडीपी यानी तेलुगु देशम पार्टी और कांग्रेस एक खेमे में थे। अगर यह नजदीकी चुनावी गठबंधन में तब्दील होती है तो टीआरएस की राहें मुश्किल हो सकती हैं। इसलिए समय से पहले चुनाव के जरिए उस भावी तालमेल के राजनीतिक असर को कम किया जा सकता है। हालांकि 2014 के लोकसभा चुनावों में टीडीपी का गठबंधन भाजपा के साथ था और उसने बेहतर प्रदर्शन किया था। लेकिन राज्य में चुनावों में प्रदर्शन को लेकर अभी जो तस्वीर बन रही है, उसमें टीडीपी और कांग्रेस को साथ आने की जरूरत शायद ज्यादा महसूस हो। इसके अलावा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनाव होने वाले हैं और एक आकलन यह है कि इन राज्यों में भाजपा की स्थिति प्रतिकूल भी हो सकती है। ऐसे में अगर कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहता है तो उसका असर तेलंगाना में पड़ सकता है और टीआरएस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। चंद्रशेखर राव को भाजपा से नजदीकी रिश्ते रखने वाले नेता के तौर पर भी देखा जाता रहा है और लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव में इसका सीधा असर राज्य के बारह फीसद अल्पसंख्यक मतों पर पड़ सकता था। दूसरी ओर, चंद्रशेखर राव ने सत्ता में आने पर राज्य का मुख्यमंत्री किसी दलित को बनाने का भरोसा दिया है। हालांकि यह सवाल कायम है कि चुनावी नतीजों के बाद क्या इस पर अमल होगा!

ताजा घटनाक्रम के साथ ऐसे आरोप सामने आने शुरू हो गए हैं कि समय से पहले विधानसभा चुनाव कराने की स्थिति पैदा करने के पीछे भाजपा के साथ टीआरएस की मिलीभगत है, क्योंकि अगर चुनाव समय से होते तो लड़ाई राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी में बदल सकती थी और टीआरएस के जनता से किए गए वादे पूरे नहीं करने का फायदा कांग्रेस को मिल सकता था। यही वजह है कि चंद्रशेखर राव सत्ता में वापसी नहीं हो पाने के डर से ‘नकारात्मक राजनीति’ कर रहे हैं। वरना कोई वजह नहीं थी कि विधानसभा को कार्यकाल पूरा होने से नौ महीने पहले ही भंग कर दिया जाए। इन आरोपों के बरक्स यह साफ है कि चंद्रशेखर राव का विधानसभा भंग कराने का फैसला अगली बार सत्ता में आने की जमीन बनाने के मकसद से जुड़ा है। मगर सवाल है कि इस भरोसे के साथ राजनीतिक बिसात बिछाने के बावजूद क्या टीआरएस का रास्ता इतना आसान साबित होगा!

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