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कठघरे में जांच

करीब दो साल पहले मध्यप्रदेश में जब बहुचर्चित व्यापमं घोटाला यानी व्यावसायिक परीक्षा मंडल में भ्रष्टाचार सामने आया, तभी कायदे से इस मसले की जांच सीबीआइ को सौंप दी जानी चाहिए थी। लेकिन मध्यप्रदेश सरकार यह कहती रही कि राज्य की एजेंसियां जांच के लिए काफी हैं। अब इस घोटाले के खिलाफ आवाज उठाने वाले […]

Author Updated: July 2, 2015 5:32 PM

करीब दो साल पहले मध्यप्रदेश में जब बहुचर्चित व्यापमं घोटाला यानी व्यावसायिक परीक्षा मंडल में भ्रष्टाचार सामने आया, तभी कायदे से इस मसले की जांच सीबीआइ को सौंप दी जानी चाहिए थी। लेकिन मध्यप्रदेश सरकार यह कहती रही कि राज्य की एजेंसियां जांच के लिए काफी हैं। अब इस घोटाले के खिलाफ आवाज उठाने वाले दो कार्यकर्ताओं ने इसकी जांच सीबीआइ से कराने के लिए मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल की है। इन्होंने राज्य में व्यापमं जैसे ही दूसरे घोटाले की भी सीबीआइ जांच की मांग की है, जिसमें निजी मेडिकल कॉलेजों में बड़ी तादाद में सरकारी कोटे से दाखिले कराए गए और हजारों करोड़ रुपए का वारा-न्यारा किया गया। बीते दो सालों में न सिर्फ इस कारनामे की जांच में कोई संतोषजनक प्रगति नहीं हुई, बल्कि इस घोटाले के आरोपियों और गवाहों की अस्वाभाविक मौतों का सिलसिला शुरू हो गया। अब तक इस प्रकरण में राज्यपाल रामनरेश यादव के बेटे शैलेश यादव सहित चालीस से ज्यादा आरोपियों और गवाहों की जान जा चुकी है। इनमें से तेईस आरोपियों की मौतों को खुद विशेष जांच दल ने अस्वाभाविक करार दिया है। जिन आरोपियों की मृत्यु हुई, उनमें से कई के परिजन हत्या की आशंका जाहिर कर रहे हैं।

हैरानी की बात है कि इतने बड़े पैमाने पर होने वाली मौतों को संदिग्ध मानने और ईमानदारी से जांच के लिए पहल करने के बजाय शिवराज सिंह चौहान सरकार इसे व्यापमं से जोड़ने को निराधार बता रही है। गृहमंत्री जांच की कोई जरूरत नहीं महसूस करते। सवाल है कि एक ही मामले से जुड़े लोगों की इतनी बड़ी तादाद में मौतें क्या यह संदेह पुख्ता नहीं करतीं कि घोटाले का दायरा अनुमान से ज्यादा बड़ा है और गवाहों और आरोपियों को इसलिए ठिकाने लगाया जा रहा है कि कहीं पूछताछ और जांच में कुछ बड़े नामों का खुलासा न हो जाए! गौरतलब है कि इस प्रकरण में राज्यपाल रामनरेश यादव और उनके बेटे शैलेश यादव का भी नाम आ चुका है। नियुक्तियों के लिए नियमों में बदलाव के मुद्दे पर मुख्यमंत्री पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसा क्यों है कि बीते दो सालों की जांच की प्रगति और आरोपियों और गवाहों की जान जाने की घटना के मद्देनजर राज्य सरकार की ओर से कराई जा रही जांच पर लोग भरोसा नहीं जता पा रहे हैं?

सच तो यह है कि अगर कुछ सामाजिक कार्यकर्ता इस घोटाले से जुड़े तथ्य सामने नहीं लाए होते, तो शायद यह मामला दबा रह जाता! यहीं एक और आशंका खड़ी हो रही है। अगर लगातार आरोपियों की मौत के पीछे कोई साजिश है, तो क्या गारंटी कि इस प्रकरण का खुलासा करने वाले कार्यकर्ताओं की जान सुरक्षित है? इस घोटाले के खिलाफ सबसे पहले आवाज उठाने वाले एक कार्यकर्ता आनंद राय ने यह चिंता जाहिर की है। अगर राज्य सरकार खुद को पाक-साफ बताने की कोशिश कर रही है तो क्या यह उसकी जिम्मेदारी नहीं है कि घोटाले के गवाहों और पकड़े गए तमाम आरोपियों के साथ-साथ इसका खुलासा करने वाले कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करे? इसके अलावा, केंद्र की भाजपा सरकार को जहां इस व्यापक घोटाले का संज्ञान लेकर ईमानदारी से इसकी जांच और दोषियों को सजा दिलाने के लिए दखल देना चाहिए, वहीं उसके प्रमुख नेता और मंत्री ललित मोदी प्रकरण और धौलपुर महल जैसे मुद्दों पर अपने बचाव में उलझे नजर आ रहे हैं।

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