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संपादकीय: तंगनजरी के बरक्स

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला को नमाज अदा करते वक्त धक्के मारे और उन पर जूते फेंके गए।

Author August 24, 2018 2:53 AM
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अबदुल्ला। (फाइल फोटो)

ईद-उल-जुहा के दिन जिस तरह कश्मीर घाटी में अलगाववादियों ने अपना विरोध जताया उससे एक बार फिर उनकी झुंझलाहट ही प्रकट हुई। ईद के पाक मौके पर हिंसक हरकतें इस्लाम के खिलाफ मानी जाती हैं, पर इसकी भी उन्होंने परवाह नहीं की। नमाज के बाद जगह-जगह पत्थरबाजी और तीन सुरक्षा कर्मियों की हत्या कर दी गई। यहां तक कि जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला को नमाज अदा करते वक्त धक्के मारे और उन पर जूते फेंके गए। दरअसल, ईद से दो दिन पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में आयोजित सर्वदलीय प्रार्थना सभा में फारूक अब्दुल्ला ने भारत माता की जय और जय हिंद के नारे लगाए थे, जो घाटी के कुछ लोगों को नागवार गुजरा। उसी की प्रतिक्रिया में उन्हें नमाज के वक्त धक्के मारे गए। अच्छी बात है कि इस घटना पर फारूक और उनकी पार्टी के लोगों ने संयम से काम लिया। उन्होंने इशारों में जाहिर कर दिया कि यह किन लोगों की हरकत है और ऐसी हरकतों से वे कभी डरने वाले नहीं। इससे निश्चय ही चरमपंथियों की झुंझलाहट और बढ़ी होगी।

समझना मुश्किल नहीं है कि घाटी में सुरक्षा बलों पर हमले, पत्थरबाजी और भारत विरोधी गतिविधियां चलाने वाले कौन हैं। अलगाववादी संगठन कश्मीर को भारत का हिस्सा मानने से इनकार करते रहे हैं। कश्मीर की आजादी के नारे के साथ ही वहां के नौजवानों को गुमराह करने और हाथ में पत्थर या हथियार उठाने को उकसाते रहे हैं। न तो वे भारतीय झंडे को स्वीकार करते हैं और न भारत माता की जय जैसे नारों को बर्दाश्त। यहां तक कि वे चुनाव प्रक्रिया में भी हिस्सा नहीं लेते। फारूक अब्दुल्ला हमेशा से कश्मीर को भारत का हिस्सा मानते रहे हैं, इसलिए वे उनकी नजरों में खटकते हैं। अब चूंकि अलगाववादियों पर कई तरह से शिकंजे कसने शुरू हो गए हैं, पुलिस कर्मियों की हत्या जैसी हरकतों के चलते स्थानीय लोगों में भी उनके प्रति समर्थन कमजोर होता नजर आने लगा है, इसलिए आजाद कश्मीर के मुद्दे को नए सिरे से हवा देने का प्रयास कर रहे हैं। पर ईद के मौके पर उनका यह प्रयास विफल ही साबित हुआ। व्यापक स्तर पर घाटी को अशांत करने में उन्हें कामयाबी नहीं मिल पाई, जैसे पहले कर दिया करते थे। अनेक मौकों पर देखा जा चुका है कि जब अलगाववादी अपनी योजनाओं में कमजोर या विफल साबित होने लगते हैं, तो अपनी झुंझलाहट स्थानीय लोगों पर उतारना शुरू कर देते हैं।

कश्मीर घाटी के लोगों के सामने असल समस्या रोजगार की है। रोजगार के नए अवसर सृजित न हो पाने की वजह से बहुत सारे शिक्षित युवा बेकार बैठे रहते हैं। अलगाववादी संगठन और कुछ कट्टरपंथी लोग इस्लाम और कश्मीर की आजादी के नाम पर उन्हें सरकार के खिलाफ भड़काने में कामयाब होते रहे हैं। आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद वे नौजवानों को बरगलाने और लंबे समय तक घाटी में अशांति का माहौल बनाए रखने में कामयाब हुए थे। अब लोग समझने लगे हैं कि हाथों में पत्थर लेकर रोजगार के मौके नहीं तलाशे जा सकते। मगर अलगाववादियों की समस्या यह है कि जैसे ही लोग सरकारी व्यवस्था पर यकीन करना शुरू करेंगे, वैसे ही उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। ऐसे में फारूक अब्दुल्ला ने भारतीयता पर दृढ़ विश्वास जताते हुए संयम से काम लेकर एक तरह से अलगाववादियों को आईना ही दिखाया है।

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