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संपादकीय: अहं की हिंसा

लगभग दो साल पहले बिहार के बोधगया में महज सड़क पर आगे निकलने के मसले पर रॉकी यादव नाम के युवक ने दूसरी कार में बैठे एक युवक की गोली मार कर जान ले ली थी। उस मामले में रॉकी यादव को अदालत से उम्र कैद की सजा मिली। यानी कानून ने हत्या के अपराध की सजा तय कर दी।

Author March 13, 2018 04:43 am
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

सड़क पर बेलगाम रफ्तार की वजह से होने वाले हादसों में लोगों की जान जाने की खबरें आम हैं। लेकिन अगर किसी मामूली बात पर हुई बहस जानलेवा हमले में तब्दील होने लगे तो यह न केवल अराजकता का मामला है, बल्कि सामाजिक व्यवहार के पहलू से भी चिंता की बात है। सड़कों पर आज यह प्रवृत्ति आम हो चुकी है कि वाहन चलाते समय किसी अन्य गाड़ी से महज छू जाने पर भी दो पक्ष इस बात का खयाल नहीं रख पाते कि उनकी अपनी जिंदगी की कीमत क्या है। इसका हासिल यह है कि देश भर में रोजाना औसतन तीन यानी सालाना एक हजार से ज्यादा लोग ऐसी बातों पर जान गंवा रहे हैं, जिनसे सामान्य समझ के बूते बचा जा सकता था। हाल के वर्षों में सड़कों पर लोगों के व्यवहार में जिस तरह बदलाव आया है और वे छोटी-छोटी बातों पर जानलेवा टकराव पर उतारू हो जा रहे हैं, उसमें ऐसी घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है।

शायद यही वजह है कि अब इस मसले पर संसद में भी चिंता जाहिर की गई है और देश में रोडरेज की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए ठोस कानून की जरूरत पर जोर दिया गया। निश्चित तौर पर सड़क यातायात के मामले में सख्त कानूनों के जरिए वाहनों की गति या ड्राइविंग के तौर-तरीके निर्धारित किए जा सकते हैं। लेकिन रोडरेज दरअसल लोगों के व्यवहार से जुड़ा मसला है, जिसमें किसी बहुत छोटी बात पर भी लोग आपा खो बैठते हैं और एक दूसरे की जान जाने की भी परवाह नहीं करते। ऐसी किसी भी घटना में हुई मारपीट में किसी व्यक्ति के बुरी तरह घायल हो जाने या उसकी जान चली जाने के बाद आमतौर पर दोनों पक्षों के पास अफसोस से ज्यादा कुछ नहीं बचता। कानूनी कसौटी पर ज्यादा से ज्यादा हिंसक बर्ताव के आधार पर दोषी के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। लेकिन ऐसी स्थिति में उसके भीतर उग्र व्यवहार का एक मनोविज्ञान होता है, जो समाज में उसके आसपास के माहौल से तैयार होता है। किसी व्यक्ति के पास कार या कोई अन्य वाहन होना पहले ही सामाजिक हैसियत का एक प्रतीक माना जाता है। श्रेष्ठता की इस ग्रंथि में पलते व्यक्ति की गाड़ी को जितना नुकसान नहीं पहुंचता, उससे ज्यादा उसके अहं को चोट लगती है और वह सीधे हिंसा पर उतर जाता है। यह स्थिति रफ्तार के बाधित होने या आगे निकलने की होड़ में भी पैदा हो सकती है।

लगभग दो साल पहले बिहार के बोधगया में महज सड़क पर आगे निकलने के मसले पर रॉकी यादव नाम के युवक ने दूसरी कार में बैठे एक युवक की गोली मार कर जान ले ली थी। उस मामले में रॉकी यादव को अदालत से उम्र कैद की सजा मिली। यानी कानून ने हत्या के अपराध की सजा तय कर दी। लेकिन निश्चित रूप से सड़क पर मामूली बात पर गोली चलाना या किसी को मार डालना अपराध के दूसरे मामलों से इतर व्यक्ति के भीतर श्रेष्ठता की ग्रंथि या झूठे अहं से जुड़ा व्यवहार है। इसे एक तरह से मानसिक बीमारी भी कहा जाना चाहिए, जिसमें व्यक्ति अपनी समझ और मानवीय संवेदना को किनारे रख कर गाड़ी से हैसियत के ऊंचा होने के भ्रम में जीता है और उसकी नजर में दूसरे लोगों का कोई महत्त्व नहीं होता है। जबकि संवेदना के साथ समझ और सहनशीलता किसी भी व्यक्ति को सभ्य बनने में मदद करती है। इसलिए सरकार और समाज को कानूनी तकाजों के साथ-साथ सामाजिक माहौल और व्यवहार के पहलू पर भी गौर करने की जरूरत है।

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