ताज़ा खबर
 

संपादकीय: बेखौफ अपराधी

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारे और महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम की शुरुआत हरियाणा से ही हुई थी और इसका जोरशोर से प्रचार किया जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि आए दिन महिलाओं के खिलाफ की ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जो ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे को मुंह चिढ़ाती हुई दिखती हैं।

Author September 15, 2018 1:57 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

हरियाणा के रेवाड़ी में एक लड़की से सामूहिक बलात्कार की वारदात ने फिर यही साबित किया है कि यहां एक स्त्री के लिए सहज जीवन जी पाना आज भी कितनी बड़ी चुनौती है। अव्वल तो हमारे समाज की परंपरा में ही मौजूद स्त्री और पुरुष के प्रति दृष्टि में भेद की वजह से महिलाओं को घर-परिवार से लेकर बाहर भी अमूमन हर मोर्चे पर दमन का शिकार होना पड़ता है। लेकिन अगर कोई लड़की हिम्मत करके पारंपरिक दायरों से आगे पढ़-लिख कर और क्षमताएं हासिल करके मुख्यधारा में अपनी जगह बनाने की कोशिश करती भी है तो सामंती मानस के अपराधी उसे हाशिये पर धकेलने की कोशिश करते हैं। रेवाड़ी की जिस लड़की को सामूहिक बलात्कार का सामना करना पड़ा, उसने कुछ समय पहले सीबीएसई की परीक्षा में राज्य में टॉप किया था और खुद राष्ट्रपति ने उसे सार्वजनिक समारोह में सम्मानित किया था। यानी एक तरह से उसे अपनी उपलब्धियों की वजह से चर्चित होने की हैसियत हासिल हो गई थी। वह अपनी कक्षा में पढ़ने-लिखने में अव्वल है और घटना के ठीक पहले कोचिंग के लिए निकली थी। इस बीच उसी के गांव के जान-पहचान के तीन युवकों ने लिफ्ट देने के नाम पर उसे अपनी गाड़ी में बिठा लिया और नशे की दवा मिला पानी पिला दिया। उसके बाद झज्जर जिले की सीमा की ओर ले जाकर बेहोशी की हालत में छात्रा से बारह लोगों ने बलात्कार किया, फिर उसे कनीना बस अड्डे पर फेंक कर भाग गए। यही नहीं, उसके बाद उन लोगों ने पीड़ित छात्रा और उसके परिवार को धमकी भी दी।

पढ़ाई-लिखाई में अपनी प्रतिभा के लिए राष्ट्रपति से पुरस्कृत होने वाली इस अपराध की पीड़ित की भावनाओं, आत्मविश्वास और समाज पर भरोसे को किस स्तर तक चोट पहुंची होगी, इसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है। पीड़िता के परिजनों के आरोप अगर सही हैं तो यह बेहद अफसोसनाक है कि पुलिस ने उनकी शिकायत लिखने में आनाकानी की और उन्हें थानों के चक्कर काटने पड़े। सवाल है कि हर स्तर पर सुरक्षा-व्यवस्था को मजबूत करने के दावे के बीच हरियाणा की यह कौन-सी तस्वीर है जहां महिलाओं की गरिमा और अधिकार खतरे में हैं। गौरतलब है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारे और महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम की शुरुआत हरियाणा से ही हुई थी और इसका जोरशोर से प्रचार किया जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि आए दिन महिलाओं के खिलाफ की ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जो ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे को मुंह चिढ़ाती हुई दिखती हैं। एक ओर, आज भी हमारा समाज जिस पारंपरिक मानसिकता में जीता है, उसमें पूर्वग्रहों से बच कर लड़कियों के लिए पढ़-लिख पाना एक खास बात लगती है, जबकि यह सहज, आम और जरूरी होना चाहिए। फिर भी अगर वह तमाम बाधाओं का सामना करते हुए अपने दम पर आगे बढ़ती है तो मर्दवादी कुंठाओं से संचालित अपराध उसकी जिंदगी तक को बाधित कर देते हैं।

कई अध्ययनों में ये तथ्य सामने आ चुके हैं कि बलात्कार की ज्यादातर घटनाओं में आरोपी या दोषी पीड़ित के आसपास के परिचित या संबंधी ही होते हैं। ऐसे में अपने आसपास किसी परिचित पुरुष पर भी कैसे कोई महिला भरोसा करे, जबकि उसके करीबी और जानकार भी उसके खिलाफ अपराध करने से नहीं हिचकते? आधुनिकता और चकाचौंध के प्रदर्शन के बीच सरकारी दावे चाहे जो हों, लेकिन हकीकत यही है कि महिलाओं के लिए हालात सहज और सुरक्षित नहीं हैं। यह स्थिति न केवल समाज के पितृसत्तात्मक सामंती मानस का उदाहरण है, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा का भरोसा देने और एक सुव्यवस्थित तंत्र का संचालन करने वाली सरकारों की क्षमता पर भी सवालिया निशान है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App