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जनसत्ता संपादकीय : विवाद का परदा

यों सभी जानते हैं कि पंजाब में नशे की समस्या दिनोंदिन गहराती गई है और यह गंभीर चिंता का कारण बन चुका है।

Author नई दिल्ली | June 9, 2016 3:28 AM
फिल्म उड़ता पंजाब 17 जून को रिलीज होनी है।

फिल्मों के प्रदर्शन और उस पर पाबंदी को लेकर विवाद पहले भी होते रहे हैं, लेकिन ‘उड़ता पंजाब’ को लेकर पैदा हुए टकराव ने जिस तरह राजनीतिक शक्ल ले ली है, वैसा कम देखा गया है। हालत यह है कि एक ओर सीबीएफसी यानी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी ने इस फिल्म के लिए आम आदमी पार्टी से धन मिलने तक की आशंका जता दी है। दूसरी ओर, अरविंद केजरीवाल ने इस फिल्म को रोकने की कोशिश में भाजपा के शामिल होने का आरोप लगाया है।

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी फिल्म के पक्ष में खुल कर अपनी राय जाहिर की है। लेकिन इस सबसे अलग एक फिल्म में प्रस्तुत कुछ दृश्यों और संवादों की वजह से रोके जाने या उसे बदलने की सलाह देने को हमेशा एक कलात्मक अभिव्यक्ति को बाधित करने के तौर पर देखा गया है। सेंसर बोर्ड की ओर से भी ऐसी ही दलील दी गई है। दरअसल, इस फिल्म के विवाद की वजह इसका विषय है, जिसमें पंजाब में नशे की शिकार युवा पीढ़ी को दिखाया गया है।

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लेकिन खबरों के मुताबिक इस क्रम में गालियां या अपशब्दों का जिस पैमाने पर इस्तेमाल किया गया है, सेंसर बोर्ड की निगाह में वे बेहद आपत्तिजनक हैं। सेंसर बोर्ड को इस बात पर भी आपत्ति है कि फिल्म के नाम में पंजाब शब्द क्यों है। इसलिए तकरीबन नब्बे दृश्यों पर कैंची चलाने के अलावा यह भी सलाह दी गई है कि फिल्म के नाम में से भी पंजाब को हटाया जाए, तभी इसे सर्टिफिकेट जारी किया जाएगा। सवाल है कि अगर फिल्म में बड़ी तादाद में युवाओं को नशे की गिरफ्त में दिखाया गया है और यह पंजाब की गलत तस्वीर है तो इसका फैसला पंजाब या दूसरे इलाकों के दर्शक करेंगे या लोगों को इस सवाल से रूबरू भी नहीं होने दिया जाएगा!

फिल्म के निर्माता अनुराग कश्यप ने इसे सेंसर बोर्ड की तानाशाही कहा है और इसके लिए अदालती लड़ाई में जाने का फैसला किया है। इससे पहले जितनी भी फिल्मों से जुड़े विवाद अदालत के पास पहुंचे, उन्होंने इसे कला और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा मामला बता कर उसके सही या गलत होने का निर्णय दर्शकों पर छोड़ देने का पक्ष लिया। यों सभी जानते हैं कि पंजाब में नशे की समस्या दिनोंदिन गहराती गई है और यह गंभीर चिंता का कारण बन चुका है।

आगामी विधानसभा चुनावों में इसका मुद्दा बनना तय माना जा रहा है और इसी मसले को फिल्म में दिखाया गया है। इसलिए माना जा रहा है कि विवाद की जड़ जितनी फिल्म है, उससे ज्यादा कुछ राजनीतिक दलों के भीतर राज्य में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर उसके प्रभावों की आशंका है। लेकिन आखिरकार यह सेंसर बोर्ड पर निर्भर है कि वह फिल्म को जारी करता है या नहीं। तो जिन मानदंडों के तहत सेंसर बोर्ड ने ‘उड़ता पंजाब’ के प्रदर्शन पर सवाल उठाया है, क्या वह बाकी तमाम फिल्मों के बारे में यही मानदंड अपनाता है? पिछले दिनों कई ऐसी फिल्में प्रदर्शित हुर्इं, जिनमें कुछ प्रस्तुतियों को लेकर आपत्ति जाहिर की गई थी। लेकिन एक फिल्म के लिए लागू शर्तें दूसरी फिल्म के संदर्भ में लागू नहीं होतीं। हो सकता है कि अभिव्यक्ति की आजादी की दलील पर कुछ फिल्मों में गैरजरूरी या आपत्तिजनक दृश्य और संवाद परोसे गए हों। क्या इसे दर्शकों के विवेक पर नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए कि वे फिल्म को कैसे देखते हैं!

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