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जनसत्ता संपादकीय : तुर्की का तख्त

अमेरिका समेत तमाम प्रमुख शक्तियों ने इसे लोकतंत्र पर हमला कहा है। तख्तापलट की कोशिश नाकाम हो गई, मगर इस दौरान हुई हिंसा में डेढ़ सौ से ज्यादा लोग मारे गए हैं और करीब डेढ़ हजार लोग घायल हैं।

Author नई दिल्ली | July 18, 2016 12:10 AM
Turkey Coup: इमाम और प्रार्थना सभा का मुखिया गुलेन 50 साल पहले टर्की सरकार की नजर में आया था।

अमूमन तख्तापलट या उसकी कोशिश पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की प्रतिक्रिया आलोचनात्मक ही होती है। स्वाभाविक ही तुर्की में तख्ता पलट की कोशिश पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के ऐसे ही बयान आए हैं। अमेरिका समेत तमाम प्रमुख शक्तियों ने इसे लोकतंत्र पर हमला कहा है। तख्तापलट की कोशिश नाकाम हो गई, मगर इस दौरान हुई हिंसा में डेढ़ सौ से ज्यादा लोग मारे गए हैं और करीब डेढ़ हजार लोग घायल हैं। तख्तापलट की कोशिश विफल हो जाने की वजह यही होगी कि सेना का विद्रोही धड़ा सेना के भीतर पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा पाया। न तो जनता का समर्थन था। लेकिन कई कर्नलों समेत सैकड़ों सैनिकों की गिरफ्तारी बताती है कि यह सिर्फ दो-चार व्यक्तियों का काम नहीं था, इसके तार कई शहरों में फैले हुए थे और इस विद्रोह के पीछे काफी तैयारी भी की गई होगी। राष्ट्रपति रेचप तैयब अर्दोआन ने तख्तापलट के पीछे ‘समांतर सत्ता’ का हाथ होने का आरोप लगाया है। माना जा रहा है कि उनका इशारा फतहुल्लाह गुलेन की तरफ है जो एक ताकतवर मुसलिम धर्मगुरु हैं और अमेरिका में रहते हैं। अलबत्ता गुलेन ने इस वाकये से दूर-दूर तक कोई ताल्लुक न होने की बात कही है। फिलहाल यह साफ नहीं है कि वास्तव में इस बगावत का सूत्रधार कौन था। लेकिन तुर्की में जो हुआ वह बहुत आश्चर्य की बात नहीं है। वहां तीन बार सैन्य तख्ता पलट हो चुका है। पहली बार 1960 में, दूसरी बार 1971 में और तीसरा बार 1980 में। इसके अलावा, तुर्की की सेना ने 1997 में वहां के प्रधानमंत्री एरबाकान को पद छोड़ने के लिए विवश कर दिया था।

मौजूदा राष्ट्रपति अर्दोआन की इस्लामी रुझान वाली पार्टी एकेपी नवंबर 2002 में सत्ता में आई और वे 2003 से 2014 तक प्रधानमंत्री रहे। प्रधानमंत्री के तौर पर तीन कार्यकाल से ज्यादा वे नहीं रह सकते थे, लिहाजा राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा और जीते। लंबे समय से सत्ता में रहने से उनका सियासी दबदबा जाहिर है। पर वे समय के साथ और निरंकुश होते गए हैं। उनकी सरकार ने बड़े पैमाने पर विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं का तो उत्पीड़न किया ही है, पत्रकारों को भी नहीं बख्शा है। इसमें न्यायपालिका का बेजा इस्तेमाल करने से भी अर्दोआन नहीं हिचके। उनकी सरकार के कई फैसलों के खिलाफ बड़े जन आंदोलन हो चुके हैं। तुर्की के पड़ोस में हैं इराक और सीरिया। इसलिए आइएस से लड़ने की खातिर पश्चिमी देशों को तुर्की की मदद बहुत उपयोगी है। यों भी तुर्की नाटो का सदस्य है और पश्चिमी देशों से अपनी नजदीकी के कारण आइएस को चुभता रहा है, जो कि पिछले दिनों इस्तांबुल के अतातुर्क अंतरराष्ट्रीय हवाई अड््डे पर हुए आतंकी हमले से भी जाहिर है। लेकिन विडंबना यह है कि एक समय सीरिया में राष्ट्रपति असद के विरोधी सशस्त्र गुटों की मदद कर चुके अर्दोआन कहीं न कहीं आइएस के उभार के भी गुनहगार हैं। तुर्की की धर्मनिरपेक्ष विरासत को जिन नेताओं ने नुकसान पहुंचाया उनमें अर्दोआन का भी नाम लिया जाता है। अपनी पार्टी एकेपी को उन्होंने पूरी तरह चुनावी मशीन में बदल दिया। उनकी यह टिप्पणी सही है कि तख्तापलट की कोशिश तुर्की के लोकतंत्र पर एक काला धब्बा है। पर चुनी हुई सरकार के वजूद के साथ-साथ नागरिक अधिकार भी लोकतंत्र की कसौटी हैं। अर्दोआन इस पर कहां तक खरे उतरते हैं?

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