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संपादकीय: परंपरा बनाम कानून

सवाल यह है कि इस मसले पर पुनर्विचार याचिका दाखिल करने वाला राष्ट्रीय अयप्पा श्रद्धालु एसोसिएशन अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ‘तर्कहीन और समर्थन से परे’ मानता है तो पांच से पचास साल उम्र की महिलाओं के साथ मंदिर में प्रवेश के मामले में भेदभाव क्या तर्क पर आधारित मान्यता है?

Author October 10, 2018 2:11 AM
सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला मंदिर में हर आयु-वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में फैसला सुनाया तो उसे महिलाओं की बराबरी के हक में एक बेहद प्रगतिशील पहल के रूप में देखा गया।

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उपजे हालात इसका ताजा उदाहरण हैं कि धार्मिक मामले और उनसे जुड़ी मान्यताएं कैसे देश की संवैधानिक व्यवस्था और कानून के सामने मुश्किल खड़ी कर देती हैं। हाल में जब सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला मंदिर में हर आयु-वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में फैसला सुनाया तो उसे महिलाओं की बराबरी के हक में एक बेहद प्रगतिशील पहल के रूप में देखा गया। यों भी, हर धार्मिक मान्यता के मुताबिक ईश्वर की अवधारणा में सभी मनुष्यों को समान माना गया है। फिर सबरीमला में स्थापित भगवान अयप्पा की पूजा-अर्चना के मामले में सदियों से यह भेदभाव किस आधार पर कायम था? धार्मिक मान्यता या आस्था का हवाला देकर किसी परंपरा को सही ठहराने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन इस मान्यता के साथ क्या किसी परंपरा में सभी को बराबर न मानने को सही कहा जा सकता है?

इसी तरह के तमाम सवालों की वजह से महिलाओं के एक बड़े तबके ने यह मांग उठाई थी कि सबरीमला मंदिर में हर आयुवर्ग की स्त्रियों को समानता के आधार पर प्रवेश का अधिकार मिलना चाहिए। लंबी अदालती लड़ाई के बाद इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट के एक पीठ ने एक के मुकाबले चार जजों के बहुमत के फैसले के साथ ही सबरीमला मंदिर में सभी आयुवर्गों की महिलाओं के पूजा-अर्चना करने को अधिकार माना। जाहिर है, अब राज्य सरकार और मंदिर के प्रबंधन पर निर्भर था कि वह महिलाओं को लेकर चले आ रहे भेदभाव को व्यवहार में खत्म कराने के अदालत के फैसले पर अमल सुनिश्चित कराए। लेकिन विडंबना यह है कि धार्मिक मान्यताओं को बिना किसी प्रश्न के मानने की मानसिकता के कारण न केवल महिलाओं का एक समूह इस फैसले के विरोध में सड़क पर उतर आया, बल्कि वहां के कुछ राजनीतिक दलों ने भी इसे धार्मिक मामलों में अदालत का गैरजरूरी दखल बता कर इसे मुद्दा बना लिया। नतीजतन, इस फैसले की समीक्षा के लिए याचिका दायर करने के लिए दबाव बनने लगा। हालांकि केरल के मुख्यमंत्री ने साफतौर पर सरकार की ओर से पुनर्विचार याचिका दाखिल करने इनकार किया और कहा कि वह अदालत के फैसले को लागू करेगी। लेकिन विडंबना है कि आस्था और संस्कृति की दलील पर भेदभाव पर आधारित पुरानी परंपरा को बनाए रखने की मांग की जा रही है।

सवाल यह है कि इस मसले पर पुनर्विचार याचिका दाखिल करने वाला राष्ट्रीय अयप्पा श्रद्धालु एसोसिएशन अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ‘तर्कहीन और समर्थन से परे’ मानता है तो पांच से पचास साल उम्र की महिलाओं के साथ मंदिर में प्रवेश के मामले में भेदभाव क्या तर्क पर आधारित मान्यता है? अलग-अलग धर्म के तहत प्रचलित मान्यताओं में कई ऐसी परंपराएं भी आम जनजीवन का हिस्सा हो जाती हैं, जो कई बार मानवीय दृष्टि से अस्वीकार्य होती हैं। एक सभ्य और विकासमान समाज समय-समय पर उन पर विचार करता है, अपने बीच पनप आई कुरीतियों को दूर करता है और अपने धर्म और मत को ज्यादा से ज्यादा बराबरी पर आधारित और मानवीय बनाता है। इस लिहाज से सबरीमला मंदिर में प्रवेश की पुरानी मान्यता का पालन करने वाले लोगों को सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर गौर करना चाहिए, जिसमें उसने इस संदर्भ में भेदभाव पर आधारित परंपरा को खत्म करने का पक्ष लिया है। दूसरी ओर, राज्य के जो राजनीतिक दल इसे परंपरा और संस्कृति पर चोट बता कर इसके विरोध में माहौल बना रहे हैं, उन्हें भी देश के संविधान का सम्मान करना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आशय समझना चाहिए।

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