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संपादकीय: अंतरिक्ष की ओर

अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने अब तक ढेरों अंतरिक्ष मिशन पर काम किया है। दूसरे ग्रहों तक अपने यान भेजे। चांद पर अमेरिका और रूस अपने अंतरिक्ष यात्रियों को दशकों पहले उतार चुके हैं।

Author August 30, 2018 2:40 AM
चार साल बाद यानी 2022 में भारत अंतरिक्ष में मानव मिशन भेज कर ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश हो जाएगा।फाइल फोटो।

अंतरिक्ष में जाना मानव का शुरू से ही सपना रहा है। अमेरिका, रूस और चीन ने तो दशकों पहले ही इसमें बाजी भी मार ली थी, लेकिन भारत के लिए यह अब तक एक सपना ही बना रहा। लेकिन अब वह वक्त दूर नहीं जब भारत का यह सपना साकार होगा। चार साल बाद यानी 2022 में भारत अंतरिक्ष में मानव मिशन भेज कर ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश हो जाएगा। साल 1984 में भारत के पहले और एकमात्र अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा अंतरिक्ष में गए थे। लेकिन तब भारत के पास इसके लिए कोई सुविधा नहीं थी और उन्हें अमेरिकी यान टी सोयूज की मदद से भेजा गया था। अब भारत जो मिशन भेजेगा, वह पूरी तरह स्वदेशी होगा। ‘गगनयान’ नाम के इसके अभियान को कामयाब बनाने के लिए भारत जरूरी प्रौद्योगिकी विकसित कर चुका है।

अंतरिक्ष की उपलब्धियों के संदर्भ में देखें तो भारत ने काफी कुछ हासिल किया है, लेकिन दुनिया के कई देशों की तुलना में हम अभी बहुत पीछे हैं। जब पहली बार चांद पर मानव ने कदम रखा था, तब भारत के वैज्ञानिक राकेट के हिस्सों को साइकिल पर रख कर प्रक्षेपण स्थल तक ले जाते थे। अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने अब तक ढेरों अंतरिक्ष मिशन पर काम किया है। दूसरे ग्रहों तक अपने यान भेजे। चांद पर अमेरिका और रूस अपने अंतरिक्ष यात्रियों को दशकों पहले उतार चुके हैं। चीन भी जल्द ही चंद्रमा पर अपना मानव मिशन भेजने और अपना अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की तैयारी में है। अगर इन सब उपलब्धियों से तुलना करके देखें तो लगता है भारत ने अभी तक कुछ नहीं किया। इसलिए भारत को अभी काफी कुछ हासिल करना है। फिर भी यह तथ्य है कि भारत आज राकेट, प्रक्षेपण यान और उपग्रह बनाने और छोड़ने में कामयाबी हासिल कर चुका है। अंतरिक्ष में यात्रियों को भेजने का मिशन काफी जोखिम भरा होता है। भारत के लिए यह चुनौती भरा इसलिए भी है कि पहली बार इतने बड़े मिशन को अंजाम दिया जाना है।

अंतरिक्ष यान, उसे भेजने के लिए प्रक्षेपण यान, यात्रियों के लिए जरूरी सुरक्षा तकनीक इसरो पहले ही विकसित कर चुका है। यह यान अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर लौटेगा भी। दस हजार करोड़ रुपए की लागत वाले इस अभियान को कामयाब बनाने के लिए इसरो कोई भी जोखिम नहीं लेना चाहता। इसलिए पहले दो मानव-रहित मिशन अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे। इसरो के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर ने तो अंतरिक्ष यात्रियों के प्रशिक्षण में अमेरिका या रूस की मदद लेने की जरूरत बताई है, क्योंकि भारत के पास फिलहाल ऐसी सुविधा नहीं है। भारत को अभी अपना अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने में काफी वक्त लगेगा। यों तो, अंतरिक्ष में मानव मिशन भेजने के लिए प्रौद्योगिकी विकसित करने का काम 2004 में शुरू हो चुका था, लेकिन बाद में इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। तब से यह मिशन आगे नहीं बढ़ पाया। हालांकि इस दिशा में छोटे-मोटे प्रयोग होते रहे।

दो साल पहले तक भी इसरो प्रमुख ने कहा था कि अंतरिक्ष में मानव को भेजना प्राथमिकता नहीं है। जाहिर है, ऐसे मिशन सिर्फ राजनीतिक नेतृत्व की इच्छाशक्ति की वजह से सिरे नहीं चढ़ पाए। भारत के पास वैज्ञानिक प्रतिभाओं की कमी नहीं है। वैज्ञानिक संस्थानों को धन और संसाधनों के अभाव से जूझना पड़ता है और तमाम बड़ी परियोजनाएं फाइलों में दबी रह जाती हैं। अगर वैज्ञानिक संस्थानों को पैसे की कमी और सरकारी अड़ंगों का सामना नहीं करना पड़ता, और राजनीतिक इच्छाशक्ति होती तो शायद हम काफी पहले ही अंतरिक्ष में जाने का सपना पूरा कर लेते!

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