देश में हवाई सफर को सुलभ एवं किफायती बनाने के लिए विमान सेवाओं के विस्तार को प्राथमिकता दी जा रही है। नए-नए अंतरराष्ट्रीय और घरेलू हवाई अड्डों का निर्माण किया जा रहा है। मगर यात्रियों की सुरक्षा के मोर्चे पर माकूल व्यवस्था का अभाव आज भी साफ नजर आता है।

तकनीकी खराबी, प्रशिक्षित कर्मियों की कमी, मौसम की अप्रत्याशित चुनौतियां और सतर्कता की गंभीरता को नजरअंदाज किए जाने से होने वाली मानवीय चूक का ही नतीजा है कि विमान हादसों का सिलसिला थम नहीं रहा है। असम के जोरहाट में शनिवार को एएन-32 परिवहन विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें वायुसेना के पांच कर्मियों की जान चली गई।

सवाल है कि देश भर में अब तक हुए विमान हादसों से सबक क्यों नहीं लिया जाता है? कोई एक ही तरह की खामी बार-बार हादसों का कारण कैसे बन रही है? क्या दुर्घटना में जान गंवाने वालों के परिवारों को आर्थिक मदद मुहैया करा देने भर से विमानन कंपनियों और संबंधित नियामक प्राधिकरणों की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है! भविष्य में इस तरह के हादसों पर रोक लगाने और विमान यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का दायित्व आखिर किसका है?

इसमें दोराय नहीं कि हाल के वर्षों में हवाई यात्रा की सुविधा को विस्तार देने के लिए उड़ानों की संख्या में बढ़ोतरी की गई है। मगर इसी अनुपात में पायलटों और अन्य प्रशिक्षित कर्मियों की तैनाती नहीं हो पाई है। इस कारण मौजूदा संचालन तंत्र पर दबाव बढ़ा है, जिससे मानवीय चूक की संभावनाएं भी बढ़ी हैं।

अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के अनुसार, लगभग पैंसठ फीसद विमान दुर्घटनाओं के पीछे मानवीय चूक एक प्रमुख कारक होती है। विमान के उड़ान भरने और जमीन पर उतरते समय जब स्थिति बिगड़ती है, तो काकपिट में होने वाला भ्रम भी हादसों का कारण बनता है।

खबरों के मुताबिक, एएन-32 परिवहन विमान के साथ भी यही हुआ, हवाईअड्डे पर उतरते समय विमान का नियंत्रण बिगड़ गया और वह रनवे से फिसल कर दो हिस्सों में टूट गया, जिससे उसमें आग लग गई। इसके अलावा हिमालयी क्षेत्रों में मौसम और भौगोलिक बनावट भी उड़ान संचालन के लिए बेहद जोखिम भरी होती है। कई बार मौसम पूर्वानुमान की सटीक जानकारी न होने से विमान हादसे का शिकार हो जाता है।

यह सवाल भी महत्त्वपूर्ण है कि क्या किसी विमान दुर्घटना के कारणों का गहराई से विश्लेषण कर संचालन व्यवस्था में सुरक्षात्मक उपायों को प्राथमिकता के आधार पर शामिल किया जाता है?

हालांकि, हादसों की जांच और विश्लेषण की प्रक्रिया में समूचे तंत्र की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई विमान दुर्घटनाओं की जांच रिपोर्ट तो सार्वजनिक ही नहीं की जाती है।

अगर हादसा बड़ा हो, तो उसकी जांच पूरी होने में लंबा वक्त लग जाता है और फिर उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। पिछले साल अहमदाबाद में हुआ एअर इंडिया का विमान हादसा इसका उदाहरण है, जिसकी अंतिम जांच रिपोर्ट एक साल बाद भी सामने नहीं आई है।

इस दुर्घटना में कुल 260 लोगों की मौत हो गई थी। हादसे के पीड़ित परिवार आज भी इस तथ्य के सामने आने का इंतजार कर रहे हैं कि आखिर उस दिन विमान में हुआ क्या था। अगर किसी विमान हादसे की जांच रिपोर्ट आने में ही एक साल से ज्यादा का वक्त लग जाए, तो यात्रियों के सुरक्षित सफर की स्थिति क्या होगी, इसका आकलन करना मुश्किल नहीं है।