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बाघ का कुनबा

पिछले काफी समय से बाघों की घटती तादाद को लेकर चिंता जताई जा रही थी। खासकर 2008 में जब देश भर में सिर्फ एक हजार चार सौ ग्यारह बाघ बचे थे, तब उनके अस्तित्व पर ही संकट माना जाने लगा था। लेकिन उसके बाद राष्ट्रीय बाघ जनगणना रिपोर्ट, 2010 में जब कुल एक हजार सात […]

पिछले काफी समय से बाघों की घटती तादाद को लेकर चिंता जताई जा रही थी। खासकर 2008 में जब देश भर में सिर्फ एक हजार चार सौ ग्यारह बाघ बचे थे, तब उनके अस्तित्व पर ही संकट माना जाने लगा था। लेकिन उसके बाद राष्ट्रीय बाघ जनगणना रिपोर्ट, 2010 में जब कुल एक हजार सात सौ छह बाघ पाए गए, तो कुछ उम्मीद बंधी। अब 2014 में की गई बाघों की गिनती की ताजा रिपोर्ट में जिस तरह दो हजार दो सौ छब्बीस की संख्या दर्ज की गई है, उससे पता चलता है कि पिछले कुछ सालों में बाघों के संरक्षण के लिए चलाए गए कार्यक्रमों या अभियानों के सकारात्मक नतीजे सामने आए हैं। दरअसल, बीते दो-तीन दशक के दौरान बाघों की गिनती लगातार गिरती चली जा रही थी और शिकार के साथ-साथ रखरखाव जैसी कई वजहों से इस पशु के जीवन पर संकट खड़े हो रहे थे। खासकर सरिस्का, रणथंभौर आदि अभयारण्यों से बाघों के गायब होने की खबरें जब-तब आ रही थीं। चिंताजनक हालात के तथ्य सामने आने के बाद सरकार की ओर से भी बाघ संरक्षण के लिए एक कार्यबल का गठन करने सहित कई कदम उठाए गए। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद कुछ अभयारण्यों में बाघों की स्थिति का जायजा लेने गए और वन्यकर्मियों की चौकसी बढ़ाने की हिदायत दी थी। जाहिर है, अगर बाघों की संख्या को घटने से रोकने और बीते तीन साल में तीस फीसद तक की बढ़ोतरी जैसी कामयाबी हासिल हो सकी है, तो यह इन्हीं कदमों का नतीजा है। बाघ बचाने की तमाम कोशिशों और कार्यक्रमों के बीच देश में संरक्षित गलियारों और वन क्षेत्रों पर मंडराते खतरे पर ध्यान देने की जरूरत अब भी है।

यह तथ्य है कि बाघों की उपस्थिति वाले क्षेत्रफल में जहां कमी देखी गई, वहीं इनकी तादाद संरक्षित क्षेत्रों में भी कम हुई थी। बाघों के संरक्षण के लिए अभयारण्यों के भीतर बसे गांवों को दूसरी जगह बसाने की योजना भी बनी थी। मगर इसके लिए उचित राशि का प्रावधान न होने के चलते वन संपदा पर निर्भर लोगों के लिए स्वेच्छा से अपना घर छोड़ना आसान नहीं था। देश के उनतालीस अभयारण्यों के भीतर बसी आबादी में परिवारों का आकार बढ़ता गया, तो स्वाभाविक रूप से बाघों के आवासीय क्षेत्र सिकुड़ते गए। विशेषज्ञों का मानना है कि वन क्षेत्र में रहने वाले लोगों को लोभ देकर या प्रभावित कर तस्करी करने वाले लोग बाघों का शिकार करने में कामयाब हो जाते हैं। यही वजह है कि अभयारण्यों में मानवीय गतिविधि को कम करने पर जोर दिया गया। मगर इस दलील पर स्थानीय बाशिंदों को तो उजाड़ने की योजना बना ली जाती है, पर्यटन और विकास के नाम पर हो रहे अतिक्रमण को रोकने के लिए कुछ नहीं किया जाता। अभयारण्यों के आसपास होटल, मोटल, मनोरंजन स्थलों और कई विकास परियोजनाओं का बिना रोकटोक चलना इसका उदाहरण है! ताजा उपलब्धि पर्यावरण, वन्यजीव और बाघों के जीवन पर काम करने वाले लोगों के लिए इसलिए भी राहत वाली खबर है कि जब दुनिया भर में इस पशु की संख्या तेजी से घटी है, वह भारत में बढ़ी है। इसलिए बिना किसी संकोच के इस कामयाबी का श्रेय वन अधिकारियों, कर्मचारियों, सामुदायिक भागीदारी और वैज्ञानिक सोच के मुताबिक इस मसले पर काम करने वाले तमाम लोगों को दिया जाना चाहिए। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जिन उपायों पर अमल करके यह उपलब्धि हासिल की गई है, अगर उनमें स्थिरता कायम नहीं रही तो नतीजे उलट भी आ सकते हैं।

 

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