jansatta Editorial The face of politics about Do not enter criminal elements in democracy - संपादकीय: राजनीति का चेहरा - Jansatta
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संपादकीय: राजनीति का चेहरा

लोकतांत्रिक ढांचे के मुताबिक देखें तो केंद्र सरकार के रुख की वजह समझी जा सकती है। लेकिन सवाल है कि लंबे समय से राजनीति में अपराधियों के घुसपैठ पर चिंता जताने के बावजूद राजनीतिक दलों ने इसका क्या हल निकाला! सच यह है कि अलग-अलग पार्टियों ने अक्सर इस पर रोक लगाने के लिए ठोस नीति और कानून बनाने की बात कही।

Author August 11, 2018 6:04 AM
नई दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट। (फाइल फोटो)

लोकतंत्र तभी तक अपनी अवधारणा के साथ कायम रह सकता है, जब तक इसमें आपराधिक तत्त्वों का प्रवेश न हो। लेकिन हमारे देश में राजनीतिक दलों ने इस मामले में इस हद तक कोताही बरती है कि आज इसकी वजह से सत्ता के लोकतांत्रिक ढांचे पर ही सवाल उठने लगे हैं। हालांकि राजनीति में आपराधिक तत्त्वों की दखलंदाजी कोई अचानक सामने खड़ी हो गई समस्या नहीं है। देश के लोकतांत्रिक स्वरूप को लेकर फिक्रमंद हलकों में इसे लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। खासतौर पर संसद और विधानसभाओं में आपराधिक पृष्ठभूमि के या इससे संबंधित मुकदमों का सामना कर रहे लोगों के प्रवेश को कई बार कानूनन प्रतिबंधित करने के मामले उठे हैं। लेकिन अब तक इस मसले पर कोई ठोस नियमन आकार नहीं ले सका है। गुरुवार को एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर चिंता जाहिर की और कहा कि राजनीतिक व्यवस्था में अपराधीकरण का प्रवेश नहीं होना चाहिए। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे लोगों के चुनाव लड़ने पर रोक की मांग वाली याचिका पर सुनवाई चल रही है। हालांकि केंद्र सरकार का मानना है कि यह विषय पूरी तरह संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।

लोकतांत्रिक ढांचे के मुताबिक देखें तो केंद्र सरकार के रुख की वजह समझी जा सकती है। लेकिन सवाल है कि लंबे समय से राजनीति में अपराधियों के घुसपैठ पर चिंता जताने के बावजूद राजनीतिक दलों ने इसका क्या हल निकाला! सच यह है कि अलग-अलग पार्टियों ने अक्सर इस पर रोक लगाने के लिए ठोस नीति और कानून बनाने की बात कही। लेकिन इक्का-दुक्का पार्टियों को छोड़ दें तो शायद ही किसी राजनीतिक दल ने आपराधिक पृष्ठभूमि के या किसी मुकदमे का सामना कर रहे लोगों को चुनाव में टिकट देने से परहेज किया। यह बेवजह नहीं है कि आज संसद और विधानसभाओं में दागी प्रतिनिधियों की खासी तादाद मौजूद है। पांच महीने पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह बताया था कि देश भर में 1765 सांसदों और विधायकों के खिलाफ 3045 आपराधिक मुकदमे लंबित हैं। इस मामले में उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है, जबकि तमिलनाडु दूसरे और बिहार तीसरे स्थान पर है। मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक दो साल या उससे अधिक की सजा वाले दोषी व्यक्ति जेल से छूटने के छह साल बाद तक चुनाव नहीं लड़ सकते। लेकिन ऐसे लोगों के आजीवन चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाने की मांग की जा रही है।

इस समस्या का एक पहलू यह भी है कि किसी मुकदमे के फैसले में दोषी ठहराए जाने तक किसी व्यक्ति को निर्दोष माना जाता है। लेकिन अगर सिर्फ मुकदमे को उम्मीदवारी के लिए अयोग्यता का आधार माना जाएगा तो इससे कुछ मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। इसी से संबंधित एक आपत्ति यह भी है कि इस तरह के कानून के राजनीतिक दुरुपयोग की आशंका खड़ी हो सकती है। चूंकि पुलिस राज्य सरकारों के मातहत काम करती है, इसलिए सत्ताधारी दल अपने विपक्षी दलों के नेताओं को झूठे मुकदमे दायर कर चुनाव लड़ने से रोकने की कोशिश कर सकते हैं। फिर कोई मुकदमा फैसले तक पहुंचने में सालों लंबा खिंच सकता है और उतने समय तक के लिए चुनाव में हिस्सा लेने से रोकना लोकतंत्र के अनुकूल नहीं माना जाएगा। जाहिर है, इन आपत्तियों को पूरी तरह दरकिनार नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद किसी आशंका को आधार बना कर राजनीतिक प्रक्रिया में आपराधिक तत्त्वों की दखलंदाजी को रोकने की कोशिशों के प्रति टालमटोल का रवैया सही नहीं होगा। इसका व्यावहारिक हल निकाल कर एक ठोस कानून बनाए जाने की जरूरत है, ताकि देश की राजनीति के चेहरे को स्वच्छ बनाया सके।

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