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संपादकीय: दागियों पर शिकंजा

दागी जनप्रतिनिधियों का मुद्दा हमेशा से उठता रहा है। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च अदालत को हलफनामा देकर बताया था कि एक हजार पांच सौ इक्यासी सांसदों और विधायकों पर करीब साढ़े तेरह हजार आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें इक्यावन सांसद और विधायक ऐसे हैं जिन पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले चल रहे हैं।

Author Published on: February 27, 2018 2:44 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

दागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का गठन ऐसा जरूरी कदम था जो काफी समय पहले ही उठाया जाना चाहिए था। ऐसे आरोपों का सामना कर रहे जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित मामलों में सुनवाई तेजी से हो, इसके लिए पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को विशेष अदालतें बनाने को कहा था। अब दिल्ली में ऐसी दो विशेष अदालतें बन चुकी हैं और इनमें एक मार्च से काम शुरू हो जाएगा। ऐसी कुल बारह विशेष अदालतें बनाई जानी हैं जो दागी जनप्रतिनिधियों के खिलाफ बरसों से लंबित पड़े मामलों की सुनवाई करेंगी। ये विशेष अदालतें फास्ट ट्रैक कोर्ट की तर्ज पर काम करेंगी। इनमें मुकदमे का निपटारा एक साल के भीतर करना होगा। विशेष अदालतों के गठन का यह फैसला सरकार को भले ही सर्वोच्च अदालत के दबाव में लेना पड़ा हो, लेकिन यह इस लिहाज से बहुत महत्त्वपूर्ण है कि आपराधिक मामलों में लिप्त जो सांसद-विधायक अब तक सिर्फ सुनवाई में देरी का फायदा उठाते आ रहे थे, वे अब नहीं बच पाएंगे।

दागी जनप्रतिनिधियों का मुद्दा हमेशा से उठता रहा है। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च अदालत को हलफनामा देकर बताया था कि एक हजार पांच सौ इक्यासी सांसदों और विधायकों पर करीब साढ़े तेरह हजार आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें इक्यावन सांसद और विधायक ऐसे हैं जिन पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले चल रहे हैं। जहां तक राज्यों का सवाल है, दागी जनप्रतिनिधियों के मामले में झारखंड पहले स्थान पर है, जहां बावन विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। दूसरे स्थान पर बिहार है जहां अट्ठावन फीसद विधायक आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। सवाल है कि अगर विधायिका में इतनी बड़ी तादाद में जनप्रतिनिधि गंभीर अपराधों से जुड़े मुकदमों का सामना कर रहे हों तो वे किस तरह के कानून या दूसरी नीतियां बनाने में अपनी भूमिका निभाएंगे? हर राजनीतिक दल चुनाव से पहले आपराधिक छवि वालों को टिकट नहीं देने के वादे करता है। लेकिन हकीकत यह है कि टिकट देते वक्त सारे दल इस सच्चाई को जानबूझ कर नजरअंदाज कर देते हैं कि वे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले किसी व्यक्ति को अपना उम्मीदवार बना रहे हैं। दरअसल, उनका एकमात्र मकसद चुनाव जीतना होता है। सारे दल और नेता इस अब तक इसी का लाभ उठाते रहे हैं कि अदालत से दोषसिद्धि होने तक कोई दोषी नहीं माना जाता। यही वह कारण है कि लंबे समय तक मुकदमे चलते रहने पर भी दागी नेताओं के लिए चुनाव लड़ने और सत्ता में बने रहने का रास्ता खुला रहता है।

चुनावी राजनीति में अपराधियों का प्रवेश न हो पाए, इसके लिए चुनाव आयोग ने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि दोषी ठहराए गए सांसद या विधायक पर चुनाव लड़ने के लिए आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर उलट रुख अख्तियार किया और कहा कि वह दोषी जनप्रतिनिधि के आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है। जाहिर है, सरकार भी नहीं चाहती कि दोषी नेताओं के खिलाफ ज्यादा सख्त कदम उठाया जाए। यह रुख साबित करता है कि सरकार कहीं न कहीं किसी अपराध के आरोपी नेताओं को संरक्षण देने की मंशा रखती है। अगर विशेष अदालतों में दागी नेताओं के मुकदमों का फैसला जल्दी होने लगे और दोषी पाए जाने की सूरत में इन्हें चुनाव लड़ने से रोका जा सके तो राजनीति को स्वच्छ बना पाना कोई मुश्किल काम नहीं है!

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