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कामयाबी के बावजूद

हिज्बुल मुजाहिदीन कमांडर सब्जार अहमद बट का मारा जाना सुरक्षाबलों की बड़ी कामयाबी है। मगर उसके बाद घाटी में जैसे हालात बन गए हैं, उससे चुनौतियां बढ़ गई हैं।

इससे पहले 23 मई को भारतीय सेना ने नौशेरा और नौगाम सेक्टर में पाकिस्तान की कुछ चौकियों को तबाह किया था।

हिज्बुल मुजाहिदीन कमांडर सब्जार अहमद बट का मारा जाना सुरक्षाबलों की बड़ी कामयाबी है। मगर उसके बाद घाटी में जैसे हालात बन गए हैं, उससे चुनौतियां बढ़ गई हैं। हालांकि सेना और सुरक्षा एजेंसियों ने पूरा ध्यान रखा है कि वैसी स्थिति पैदा न होने पाए जैसी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद हुई थी। सब्जार बुरहान वानी का उत्तराधिकारी था। वानी के बाद उसने हिज्बुल की कमान संभाली थी। सेना ने शनिवार आधी रात को पूरी सुरक्षा व्यवस्था के बीच सब्जार के शव को दफना दिया, ताकि उसके जनाजे में शामिल होने के बहाने फिर वैसा माहौल न बनने पाए जैसा पिछले साल जुलाई में बुरहान वानी के जनाजे के वक्त बना था। हालांकि सब्जार के मारे जाने के बाद लोग उसी तरह सड़कों पर उतर आए और सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकने लगे, जिसमें एक नागरिक मारा गया और कई घायल हो गए। फिलहाल कश्मीर के दस जिलों में कर्फ्यू लगा दिया गया है और मोबाइल, इंटरनेट सेवाएं रोक दी गई हैं। कुछ अलगाववादी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है, ताकि लोगों को भड़काने का सिलसिला रोका जा सके। मगर इससे घाटी में स्थिति सामान्य बनाने में कितनी मदद मिलेगी, दावा करना मुश्किल है।

छिपी बात नहीं है कि घाटी के युवाओं को बरगलाने में अलगाववादी नेताओं का बड़ा हाथ है। वे कश्मीर की आजादी का नारा बुलंद कर घाटी में अस्थिरता का माहौल बनाए रखने की कोशिश करते हैं। ऐसे में बुरहान वाली या फिर सब्जार जैसे चरमपंथियों के मारे जाने के बाद उन्हें अपने मंसूबों को अंजाम देने का मौका मिल जाता है। उन्हें आम नागरिकों से दूर रख कर युवाओं को गुमराह करने की कोशिशों पर लगाम लगाने में कुछ हद तक कामयाबी पाई जा सकती है। सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि सीमा पार से उन्हें मिलने वाली मदद पर रोक लगा कर उन्हें काफी हद तक कमजोर किया जा चुका है, पर अभी घाटी के हालात जिस कदर बिगड़ चुके हैं, उसमें सिर्फ हुर्रियत नेताओं पर शिकंजा कस कर या फिर सेना के जरिए अमन बहाली का दम भरना आसान नहीं लगता। जब-तब वहां के युवा हाथों में पत्थर लिए सड़कों पर उतर आते हैं। पिछले दिनों जिस तरह हरदम हिजाब में रहने वाली, स्कूली बच्चियों ने सुरक्षाकमिर्यों पर पत्थर उछाले उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां के स्थानीय लोगों में किस कदर विद्रोह भर चुका है। अलगाववादियों और चरमपंथियों के मंसूबे तो बंदूक के बल पर कुछ हद तक कमजोर किए जा सकते हैं, पर वही सलूक आम नागरिकों के साथ नहीं किया जा सकता।

सेनाध्यक्ष ने एक बार फिर दोहराया है कि अगर आम लोग सुरक्षाबलों के कामकाज में बाधक बनते हैं, तो उनके साथ भी कड़ा बर्ताव किया जाएगा। यह बात केंद्र सरकार भी कह चुकी है। जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री ने भी कहा कि जब तक घाटी में हालात सामान्य नहीं होते, सेना का विशेषाधिकार कम करने पर विचार नहीं किया जाएगा। मगर इन बातों से वहां के लोगों में भय या फिर किसी तरह का सहयोग का भाव नहीं दिखता, तो इसकी वजहों को समझने की जरूरत है। सेना और सुरक्षाबल अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह मुस्तैदी से करते रहें, पर घाटी के सामान्य नागरिकों का विश्वास जीतने, उन्हें अमन बहाली में सहयोग को आगे आने के लिए बंदूक के बल पर तैयार नहीं किया जा सकता। उसके लिए राजनीतिक स्तर पर संवाद कायम होना चाहिए।

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