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पूर्वोत्तर में आतंक

भारत में सक्रिय उग्रवादी गुटों में अधिकतर पूर्वोत्तर से ताल्लुक रखते हैं। देश के इस हिस्से में सेना और अर्धसैनिक बलों पर आतंकवादी हमलों और उनसे निपटने के लिए की जाने वाली कार्रवाई का लंबा इतिहास है। लेकिन गुरुवार को मणिपुर के चंदेल जिले में सेना के काफिले पर हुए हमले ने पूर्वोत्तर को लेकर […]

भारत में सक्रिय उग्रवादी गुटों में अधिकतर पूर्वोत्तर से ताल्लुक रखते हैं। देश के इस हिस्से में सेना और अर्धसैनिक बलों पर आतंकवादी हमलों और उनसे निपटने के लिए की जाने वाली कार्रवाई का लंबा इतिहास है। लेकिन गुरुवार को मणिपुर के चंदेल जिले में सेना के काफिले पर हुए हमले ने पूर्वोत्तर को लेकर नए सिरे से चिंता जगाई है। पिछले तीन दशक में पूर्वोत्तर में इतना बड़ा आतंकवादी हमला इससे पहले नहीं हुआ था। घात लगा कर किए गए इस हमले में अठारह जवान शहीद हो गए और ग्यारह घायल हो गए। साफ है कि हमला एकदम सुनियोजित था, हमलावरों को आवाजाही सुनिश्चित करने या गश्त पर निकलने वाली टुकड़ियों की हर गतिविधि का पता रहा होगा। मगर दूसरी तरफ खुफिया एजेंसियां उग्रवादियों की साजिश की भनक पाने में नाकाम रहीं। इस घटना से जाहिर है कि आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों को पर्याप्त चौकस बनाने का काम अभी बाकी है। मणिपुर आजादी के एक-दो साल बाद से ही उग्रवादी हिंसा का शिकार रहा है, जहां अक्तूबर 1949 में भारतीय संघ में हुए राज्य के विलय के विरोध के नाम पर कई हिंसक गुट पनपे। वहीं मणिपुर के नगा बहुल इलाकों में उन संगठनों की भी हिंसक गतिविधियां चलती रही हैं जो नगालिम या वृहत्तर नगालैंड का सपना पाले हुए हैं।

सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के अलावा ये संगठन आम लोगों के भयादोहन और अवैध उगाही में भी लिप्त रहे हैं। चिंता का नया आयाम यह है कि पूर्वोत्तर के कई उग्रवादी गुटों ने मिल कर एक साझा संगठन बना लिया है। इसमें मणिपुर में सक्रिय गुटों के अलावा कामतापुर लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन, नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम का खापलांग गुट और एनडीएफबी का सोनबिजित गुट और उल्फा का परेश बरुआ गुट शामिल हैं। कयास है कि ताजा हमले के पीछे इन सभी की मिलीभगत रही होगी। जाहिर है, इस आतंकवादी घटना को अंजाम देने वालों की सक्रियता मणिपुर, असम, नगालैंड जैसे कई राज्यों में है। एनएससीएन का खापलांग गुट चौदह साल तक संघर्ष विराम समझौते में शामिल रहा। हालांकि इस दौरान भी अवैध वसूली की उसकी करतूत जारी रही। पर कुल मिला कर इन वर्षों में नगालैंड में शांति बनी रही। खापलांग ने इस साल मार्च में संघर्ष विराम समझौते से बाहर आने की घोषणा कर दी। इसके फलस्वरूप उग्रवादी हिंसा बढ़ने की आशंका जताई जा रही थी, जो सही साबित हुई है। लेकिन केंद्र ने इस खतरे को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया। संघर्ष विराम तोड़ने के कुछ ही दिनों के भीतर खापलांग गुट ने मणिपुर के तामेनलांग जिले में दो जवानों की हत्या कर अपने इरादे जता दिए थे। फिर, मई के पहले हफ्ते में उसने नगालैंड में असम राइफल्स के सात जवानों की हत्या कर दी। और अब खापलांग सहित पूर्वोत्तर के अनेक उग्रवादी गुट आ मिले हैं।

बांग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद वहां उल्फा को चोरी-छिपे पनाह मिलना बंद हो गया। वाजपेयी सरकार के समय पूर्वोत्तर के उग्रवादियों के लिए भूटान में जा छिपने का सिलसिला खत्म हुआ। लेकिन म्यांमा की सीमा में खापलांग और पूर्वोत्तर के दूसरे हथियारबंद गुटों को मदद मिलने का क्रम जारी है। ताजा हमले के बाद केंद्र ने पूर्वोत्तर को आतंकवाद से निजात दिलाने के लिए सख्ती से पेश आने का फैसला किया है; उसे म्यांमा-शासन का सहयोग पाने की भी कोशिश करनी होगी। पूर्वोत्तर में मिजोरम सबसे शांतिपूर्ण राज्य है जिसका श्रेय राजीव गांधी और ललडेंगा के बीच हुए शांति-समझौते को जाता है। इस तरह की राजनीतिक पहल दोनों पक्षों की रजामंदी से ही संभव होती है। पर यह सवाल जरूर उठता है कि चौदह साल के संघर्ष विराम समझौते के दरम्यान खापलांग गुट को हथियार-रहित क्यों नहीं किया जा सका।

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