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फिर फ्लू

राजस्थान के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और आंध्र प्रदेश की एक सांसद के स्वाइन फ्लू की चपेट में आने की खबरों के बाद भले इसकी गंभीरता पर चर्चा शुरू हो गई है, लेकिन हकीकत यह है कि पिछले करीब दो महीने से इस बीमारी के चलते चिंताजनक स्थिति बनी हुई है। […]

राजस्थान के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और आंध्र प्रदेश की एक सांसद के स्वाइन फ्लू की चपेट में आने की खबरों के बाद भले इसकी गंभीरता पर चर्चा शुरू हो गई है, लेकिन हकीकत यह है कि पिछले करीब दो महीने से इस बीमारी के चलते चिंताजनक स्थिति बनी हुई है। महीने भर पहले दिल्ली में स्वाइन फ्लू की वजह से पांच लोगों की मौत हो गई। मगर सरकार की निगाह में यह शायद कोई गंभीर स्थिति नहीं थी। इस बीमारी से कई लोगों के मरने की खबरों के बावजूद कुछ दिन पहले तक स्वास्थ्य विभाग स्वाइन फ्लू के मामलों को साधारण बुखार कह कर टालते दिख रहे थे।

आज यह बीमारी देश के कई हिस्सों में पांव पसार चुकी है, बेहद सुरक्षित माहौल में रहने वाली कुछ शख्सियतें भी इसकी जद में आ गई हैं। इससे जाहिर है कि स्वाइन फ्लू की रोकथाम के मामले में सरकार का रुख और बचाव के मकसद से उठाए गए कदम नाकाफी रहे। जबकि पिछले पांच सालों के दौरान स्वाइन फ्लू के उभरने का मौसम, कारण और बचाव के इंतजाम के मामले में कुछ खास बातें दर्ज की जा चुकी हैं। मगर विडंबना है कि सरकारी महकमे तब तक सक्रिय नहीं होते, जब तक किसी रोग से पैदा हुई समस्या काबू से बाहर नहीं होने लगती। फिर मौसम या दूसरी वजहों से बीमारी का प्रकोप कमजोर पड़ने लगता है, तो सरकार यह मान कर निश्चिंत हो जाती है कि समस्या खत्म हो गई। ऐसी ही लापरवाही के चलते कई ऐसे लोगों की भी जान चली जाती है, जिन्हें थोड़े एहतियात से बचाया जा सकता था।

दरअसल, इस बुखार को समय पर पहचान पाना अब भी एक समस्या बना हुआ है। साधारण बुखार समझ कर लोग आमतौर पर इसकी गंभीरता की अनदेखी करते रहते हैं और इसके लक्षण को ठीक से नहीं समझ पाते। तेजी से बदलते मौसम में बुखार या सांस फूलने की परेशानी को सामान्य मान लिया जाता है और कई बार लोग उसका घरेलू इलाज करने लगते हैं।
मगर थोड़ा वक्त भी स्वाइन फ्लू के विषाणु के फैलने में सहायक साबित होता है और यह स्थिति जान के लिए जोखिम का मामला बन सकती है। लोगों के बीच मामूली जागरूकता से इस खतरनाक बीमारी से बचा जा सकता है। लेकिन जहां दिल्ली में सरकार की ओर से चलाए गए अभियानों का साफ असर देखा गया और स्वाइन फ्लू के तकरीबन पांच सौ मामले सामने आने के बावजूद कम लोगों की जान गई, वहीं देश भर में इस बुखार के फैलने और उससे लोगों के मरने के आंकड़े चिंताजनक हैं। तेलंगाना और राजस्थान आज स्वाइन फ्लू से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य हैं। अकेले हैदराबाद में इनफ्लूएंजा एच1 एन1 से प्रभावित करीब पौने सात सौ मामले पाए गए।

देश भर में जनवरी से अब तक दो हजार से ज्यादा स्वाइन फ्लू से पीड़ितों की पहचान की गई, जिनमें से एक सौ इक्यानवे लोगों की जान चली गई। राजस्थान में सबसे ज्यादा उनचास लोगों की मौत हुई। भारत में इसका सबसे ज्यादा कहर 2010 में बरपा था, जब करीब बीस हजार लोग इसकी चपेट में आए और उनमें से साढ़े सत्रह सौ लोगों की जान चली गई। उसके बाद बेशक मौतों के मामले कम दर्ज हुए, मगर सच यह है कि बीते पांच सालों से स्वाइन फ्लू का कम या ज्यादा कहर लगातार बना हुआ है। मगर अब भी इससे पार पाने का कोई पुख्ता इंतजाम नजर नहीं आता।

 

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