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स्वच्छता की संस्कृति

यह सामान्य समझ का मामला है कि अगर जलसे, धरने-प्रदर्शन आदि के लिए किसी स्थान का उपयोग किया जाए तो कार्यक्रम खत्म होने के बाद वहां गंदगी फैला कर न छोड़ दिया जाए। अधिकारों के साथ कर्तव्य अभिन्न रूप से जुड़े होते हैं। मगर हमारे समाज में बहुत कम लोग इसका ध्यान रखते हैं। वही […]

Author April 23, 2015 14:12 pm

यह सामान्य समझ का मामला है कि अगर जलसे, धरने-प्रदर्शन आदि के लिए किसी स्थान का उपयोग किया जाए तो कार्यक्रम खत्म होने के बाद वहां गंदगी फैला कर न छोड़ दिया जाए। अधिकारों के साथ कर्तव्य अभिन्न रूप से जुड़े होते हैं। मगर हमारे समाज में बहुत कम लोग इसका ध्यान रखते हैं। वही काम जब कानूनन अनिवार्य बना दिया जाता है तो लोग उसका पालन करने लगते हैं। इस लिहाज से देखें तो शहरी विकास मंत्रालय की ओर से सार्वजनिक समारोहों के आयोजन के संबंध में जारी नए दिशा-निर्देशों का यही महत्त्व है। इनके तहत किसी भी सार्वजनिक समारोह के आयोजन के बाद उस स्थल की साफ-सफाई की व्यवस्था करना भी आयोजकों की जिम्मेदारी होगी। अब किसी भी समारोह या कार्यक्रम की इजाजत के वक्त संबंधित स्थल के लिए सुरक्षा राशि के तौर पर दस हजार से एक लाख रुपए तक की पेशगी ली जाएगी। यह रकम आयोजक को तभी लौटाई जाएगी जब वह आयोजन स्थल के इस्तेमाल के बाद छह घंटे के भीतर वहां सफाई करा दे।

दरअसल, शादी-ब्याह, सभाओं-गोष्ठियों या दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर समारोहों के दौरान आयोजन स्थल पर जिस तरह साफ-सफाई का खयाल रखा जाता है, वही स्थिति कार्यक्रम खत्म होने के बाद नहीं रहती। आमतौर पर पानी की बोतलें, प्लेटें और बचा-खुचा खाना, सजावट के सामान, कागज वगैरह चारों ओर बिखरे पड़े होते हैं, जो सड़-गल कर कई दिन तक बदबू फैलाते या हवा से साथ उड़ते रहते हैं। इसकी वजह से आसपास का माहौल प्रदूषित होता रहता है। समाज में यह विचित्र आदत दिखती है कि लोग अपने घरों की सफाई में तो कोई कोताही नहीं बरतते, पर बाहर और कई बार अपने ही दरवाजे के आसपास बिखरी गंदगी की अनदेखी करते हैं। यह एक सभ्य समाज में सुविधाओं के मनमाने उपयोग के बरक्स अपनी जिम्मेदारियों के प्रति घोर लापरवाही का नतीजा है।

स्वच्छ जीवनशैली किसी भी समाज की संस्कृति में घुली-मिली होनी चाहिए। अगर खुद शासन की नीतियां और व्यवहार ऐसे सामाजिक व्यवहार को लक्षित हों तो आम जनता भी इससे प्रेरित होगी। इस मसले पर एक सकारात्मक संदेश देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल महात्मा गांधी की जयंती के दिन स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया था। शुरुआती दौर में शासन से लेकर आम जनता के बीच इस मसले पर काफी उत्साह देखा गया। लेकिन लगता है, पिछले कुछ समय से सरकार और भाजपा के लिए यह कोई महत्त्वपूर्ण मुद्दा नहीं रह गया है। यह भी देखा जा सकता है कि आसपास के माहौल को स्वच्छ रखने के प्रति लोग धीरे-धीरे उदासीन होते जा रहे हैं।

सच यह है कि आम लोग अपने आसपास के माहौल से प्रभावित होते हैं और उसी के मुताबिक उनकी जीवनशैली तय होती है। इसलिए सरकार या शासन को अपनी ओर से इस तरह का माहौल बनाना चाहिए। दिल्ली में मेट्रो रेल इसका उदाहरण है। मेट्रो रेल प्रबंधन की ओर से साफ-सफाई का बेहतर माहौल बनाया गया है और लगभग सभी लोग कम से कम मेट्रो परिसर के भीतर स्वच्छता का ध्यान रखते हैं। इसके अलावा, अगर कचरा फेंकने के लिए प्रशासन की ओर से कूड़ेदान की व्यवस्था जरूरत की सभी जगहों पर मुहैया कराई जाए तो लोग धीरे-धीरे उसके उपयोग के प्रति अभ्यस्त हो जाएंगे। गंदगी फैलाने वालों से जुर्माना वसूलना एक उपाय है, मगर ज्यादा बेहतर और स्थायी नतीजे के लिए जरूरी है कि सफाई को समाज की संस्कृति के रूप में विकसित किया जाए।

 

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